धाराशिव में बारिश ने धोखा दिया, कलेक्टर की रिपोर्ट में खरीफ फसल पर बड़ा संकट
जिला कलेक्टर किर्ती किरण पुजार की रिपोर्ट के मुताबिक धाराशिव के लगभग 95 फीसदी खरीफ इलाके में सूखे का असर, 80 से 85 फीसदी से ज्यादा नुकसान की आशंका।
धाराशिव जिले में इस साल बारिश के मिजाज ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। जून-जुलाई में तो बारिश ठीकठाक हुई, लेकिन अगस्त में अचानक बारिश गायब हो गई और सितंबर में भी यही हाल रहा। जिला कलेक्टर किर्ती किरण पुजार की एक संक्षिप्त रिपोर्ट के मुताबिक जिले के करीब 95 फीसदी खरीफ इलाके में तेज नमी का तनाव पैदा हो गया है, और 80 से 85 फीसदी से ज्यादा फसलों के बर्बाद होने की आशंका जताई गई है। फसलें सूखकर वक्त से पहले पकने की हालत में पहुंच गई हैं, इसलिए अब बारिश हो भी जाए तो पैदावार बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम बची है।
धाराशिव जिले की औसत बारिश 603.10 मिमी होती है, मगर इस बार शुरू से ही बारिश का पैटर्न गड़बड़ रहा। जून में औसत का 97.60 फीसदी और जुलाई में 100.10 फीसदी बारिश हुई, लेकिन अगस्त में बारिश ने अचानक मुंह मोड़ लिया। इस महीने सिर्फ 43.1 मिमी यानी 27.90 फीसदी बारिश दर्ज हुई। सितंबर में भी हालात नहीं बदले, 14 सितंबर तक केवल 6.8 मिमी यानी 3.7 फीसदी बारिश हुई। नतीजा यह कि जून से 14 सितंबर के बीच औसत की तुलना में 48.49 फीसदी बारिश की कमी रह गई।
अगस्त महीने में जिले के अलग-अलग हिस्सों में लगातार 29 से 35 दिन तक बारिश का खंड (गैप) रहा। सितंबर में भी 7 से 12 दिन बारिश गायब रही। जिले के 57 राजस्व मंडलों में से जहां स्वचालित मौसम केंद्र लगे हैं, उन 45 मंडलों के रिकॉर्ड के मुताबिक जून में 22, जुलाई में 12, अगस्त में 29 और सितंबर में 17 दिन बारिश नहीं हुई। जून से सितंबर के बीच कुल मिलाकर 80 दिन बारिश का खंड रहा, जिससे फसलों की बढ़वार के सबसे अहम दौर में जमीन की नमी कम हो गई।
इस बार जिले में 5 लाख 39 हजार 27 हेक्टेयर में खरीफ की बुवाई हुई है, जिसमें सोयाबीन का रकबा 4 लाख 67 हजार 322 हेक्टेयर यानी 86.70 फीसदी है। इसके बाद तूर 34 हजार 831 हेक्टेयर, उड़द 21 हजार 886 हेक्टेयर और मूंग 5 हजार 544 हेक्टेयर में बोई गई है। बारिश की लंबी खींच का सबसे ज्यादा असर हल्की जमीन पर लगी सोयाबीन और उड़द की फसलों पर पड़ा है। कई जगह फसलें पूरी तरह सूख गई हैं और किसान सोयाबीन उखाड़कर जानवरों को चारे के तौर पर खिला रहे हैं। मध्यम से भारी जमीन की फसलों में भी फूल आने, फली या बालियां बनने और दाना भरने की प्रक्रिया पर बड़ा असर पड़ा है।
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि लंबे समय से बारिश न होने की वजह से फसलों में तेज नमी का तनाव बन गया है और करीब 95 फीसदी इलाके की फसलें सूखकर वक्त से पहले पकने की हालत में पहुंच चुकी हैं। इस स्टेज के बाद बारिश हो भी जाए तो फसल की जैविक बढ़वार और पैदावार के तत्व पहले जैसे होने की गुंजाइश सीमित रह जाती है। यानी आगे बारिश आए भी तो पैदावार में हुई कमी की भरपाई की उम्मीद कम ही है।
आईआईटी बॉम्बे की रिपोर्ट के मुताबिक एमएनसीएफसी के आकलन के आधार पर 1 जून से 21 अगस्त के बीच जिले की बारिश की स्थिति 'डिफिशियंट' (-20 से -60 फीसदी) श्रेणी में रही, जबकि 6 से 21 अगस्त के बीच यह 'स्कैंटी' (-60 से -100 फीसदी) की गंभीर श्रेणी में दर्ज हुई। मॉइश्चर एडिक्वेसी इंडेक्स से भी साफ हुआ कि अलग-अलग तालुकों में जमीन में मौजूद नमी की हालत ठीक नहीं है।
फसलों के संकट के साथ-साथ जिले में जलभंडारण की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। जिले में बड़े, मध्यम और छोटे मिलाकर कुल 225 जलप्रकल्प हैं, जिनकी कुल उपयोगी पानी की क्षमता 725.40 दलघमी है, लेकिन फिलहाल सिर्फ 55.030 दलघमी यानी आठ फीसदी पानी ही बचा है। भूजल विकास यंत्रणा के 114 निगरानी कुओं के रिकॉर्ड के मुताबिक सितंबर 2026 में औसत भूजल स्तर 9.53 मीटर है, जो पिछले पांच साल के औसत के मुकाबले 7.02 मीटर कम है। इससे खरीफ फसलों के बाद आने वाले वक्त में पीने के पानी का संकट भी और गंभीर होने की आशंका है।
एक तरफ बारिश न होने से खरीफ फसल हाथ से निकलने की नौबत है, तो दूसरी तरफ घटता जलभंडार और गिरता भूजल स्तर, इस दोहरी मुसीबत में जिले का किसान फंस गया है। प्रशासन ने 2 सितंबर को विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, तहसीलदारों, तालुका कृषि अधिकारियों, आईआईटी बॉम्बे के प्रतिनिधियों और प्रगतिशील किसानों को साथ लेकर हर मंडल में कम से कम दो गांवों में सीधे फसलों का मुआयना कर रिपोर्ट देने का आदेश दिया था। इन निरीक्षण रिपोर्टों से यह बात सामने आई है कि बारिश के असमान बंटवारे, लंबे गैप और अगस्त में कम बारिश की वजह से खरीफ फसलों की हालत गंभीर हो गई है। इसलिए अब सिर्फ बारिश आने की उम्मीद पर निर्भर रहने की बजाय असली नुकसान के आधार पर किसानों को राहत देना सरकार और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
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