वर्ल्ड क्लीनअप डे: एस्टोनिया के एक आइडिया ने कैसे बदल दी दुनिया की सफाई मुहिम
20 सितंबर को मनाए जाने वाले वर्ल्ड क्लीनअप डे की शुरुआत एस्टोनिया से हुई थी, जहां हजारों वालंटियर्स ने महज पांच घंटे में पूरा देश साफ कर दिया था।
कचरे की समस्या अब किसी एक शहर या देश तक सीमित नहीं रह गई है, यह पूरी दुनिया के सामने खड़ी एक बड़ी मुसीबत बन चुकी है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक और ऐसा कचरा जो आसानी से खत्म नहीं होता, नदियों, समुद्रों और जमीन पर जमा होता जा रहा है। इसी संकट से लड़ने और लोगों को फिर से प्रकृति के करीब लाने के मकसद से हर साल 20 सितंबर को 'वर्ल्ड क्लीनअप डे' यानी विश्व स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। यह दिन दुनियाभर के लोगों को याद दिलाता है कि धरती ही हमारा इकलौता घर है और इसे साफ रखना सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि हर इंसान का काम है।
इस दिन की कहानी काफी दिलचस्प और प्रेरणादायक है। इसकी शुरुआत 2008 में यूरोप के छोटे से देश एस्टोनिया से हुई थी। उस वक्त एस्टोनिया के 50,000 से ज्यादा लोगों और वालंटियर्स ने बिना किसी सरकारी दबाव के खुद आगे बढ़कर फैसला लिया कि वे अपने देश को साफ करेंगे। इन लोगों ने सिर्फ 5 घंटे के अंदर पूरे देश में फैला अवैध कचरा उठाकर देश को चमका दिया। एस्टोनिया की इस कामयाबी से प्रभावित होकर बाकी देशों ने भी यह आइडिया अपनाना शुरू कर दिया। आज 'लेट्स डू इट वर्ल्ड' नाम की संस्था की अगुवाई में यह मुहिम 190 से ज्यादा देशों तक पहुंच चुकी है, जिसमें लाखों लोग अपनी मर्जी से हिस्सा लेते हैं।
पर्यावरण को बचाने में इस पहल के बड़े योगदान को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 20 सितंबर को आधिकारिक तौर पर 'अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता दिवस' घोषित कर दिया है। हर साल इस दिन नदी किनारों, समुद्र तटों, ऐतिहासिक जगहों, पार्कों और शहर की गलियों को साफ करने के लिए लाखों वालंटियर, स्कूल, कॉलेज और सामाजिक संस्थाएं सड़कों पर उतर आती हैं। इकट्ठा किए गए कचरे को छांटकर प्लास्टिक और कांच को रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है।
आजकल प्लास्टिक प्रदूषण प्रकृति के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एक बार इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक हजारों साल तक जमीन या समुद्र में वैसे ही पड़ा रहता है, जिससे जलीय जीवों, जंगली जानवरों और इंसानों की सेहत को बहुत नुकसान पहुंचता है। यह दिन याद दिलाता है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल जितना कम हो सके उतना कम करना, कचरा खुले में न फेंककर डस्टबिन में डालना और गीले-सूखे कचरे को अलग-अलग करना हर किसी की रोज की आदत बन जानी चाहिए।
यह दिन सिर्फ साल के एक दिन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीने का तरीका बदलने का संदेश देता है। बाजार जाते वक्त कपड़े या जूट के थैले इस्तेमाल करना, घर में ही गीले और सूखे कचरे को अलग रखना, ज्यादा से ज्यादा चीजों को दोबारा इस्तेमाल करना और ई-कचरे को सही जगह देना, और अपने मोहल्ले में हफ्ते में कम से कम एक बार सफाई मुहिम में शामिल होना, ऐसे छोटे-छोटे कदम आगे चलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। अगर आने वाली पीढ़ियों को साफ-सुथरी और हरी-भरी धरती देनी है, तो कचरे के खिलाफ यह लड़ाई आज से ही शुरू करनी होगी।