गिरनार पर्वत पर भगवान ऋषभदेव का प्राचीन मंदिर, जैन धर्म में खास महत्व
गुजरात के गिरनार पर्वत पर स्थित ऋषभदेव मंदिर जैन धर्म के पहले तीर्थंकर को समर्पित है, जानिए इसका इतिहास और महत्व
गुजरात में स्थित गिरनार पर्वत जैन धर्म के मानने वालों के लिए बेहद पवित्र तीर्थस्थान माना जाता है। इसी पर्वत के पहले पड़ाव पर भगवान ऋषभदेव का प्राचीन मंदिर बना हुआ है, जो मुख्य जैन मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए नीचे से करीब 3800 से 4000 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
पुराने जमाने में गिरनार को अलग-अलग नामों से जाना जाता था, जैसे उर्ज्जयंत, रैवतक और रेवतगिरी। इस पर्वत का जिक्र प्राचीन साहित्य और शिलालेखों में भी मिलता है। मराठी विश्वकोश के मुताबिक गिरनार का उल्लेख अशोक से भी पहले के काल से मिलता है, और यहां ईसा पूर्व तीसरी सदी का अशोककालीन शिलालेख भी मौजूद है।
जैन धर्म में ऋषभदेव को पहला तीर्थंकर माना जाता है। जैन परंपरा के अनुसार उन्होंने इंसानों को जीवन में काम आने वाली कई कलाएं और व्यवसाय सिखाए, और उसके बाद संसार छोड़कर अध्यात्म का रास्ता चुन लिया। यही वजह है कि जैन धर्म के इतिहास में ऋषभदेव का स्थान बहुत ऊंचा माना जाता है।
गिरनार का ऋषभदेव से नाता जैन परंपरा में पुराने समय से बताया जाता रहा है। हालांकि गिरनार पर्वत का सबसे मशहूर और प्रमुख जैन तीर्थ भगवान नेमिनाथ यानी 22वें तीर्थंकर की दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण से जुड़ा हुआ है। इसलिए गिरनार पर ऋषभदेव की बात करते वक्त इसे पूरे गिरनार की जैन परंपरा से जोड़कर देखना ही ठीक रहता है।
गिरनार पर्वत पर कई और प्राचीन जैन मंदिर और तीर्थस्थल भी मौजूद हैं। इनमें भगवान नेमिनाथ का मंदिर खासतौर पर मशहूर है। पर्वत के अलग-अलग छोर पर जैन तीर्थंकरों और साधुओं की चरण पादुकाएं, मंदिर और दूसरे धार्मिक स्थल भी देखने को मिलते हैं। अंबिका देवी का मंदिर, राजुल की गुफा और नेमिनाथ का मंदिर, ये सभी इसी तीर्थ परंपरा का हिस्सा हैं। कहा जाता है कि यहां के मंदिरों की नक्काशी राजस्थान के मशहूर दिलवाड़ा मंदिर से काफी मिलती-जुलती है।
पूरे गिरनार पर्वत पर कुल पांच मुख्य पड़ाव हैं। पहले ही पड़ाव पर भगवान ऋषभदेव के मंदिर के अलावा दिगंबर जैन मंदिर, राजुलमती गुफा और बाहुबली की मूर्ति भी देखने को मिलती है।