गणपति विसर्जन के बाद कलश की चीजों को घर पर कैसे और कहां रखें, जानें तरीका
गणेशोत्सव में पूजा के दौरान स्थापित किए गए कलश और उसमें रखी चीजों को विसर्जन के बाद फेंकने की बजाय आदर के साथ ठिकाने लगाने की परंपरा बताई गई है।
गणेशोत्सव भगवान गणेश को समर्पित सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इस दौरान भक्त पूरी श्रद्धा से बाप्पा की स्थापना घर या मंडप में करते हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं। सुख, समृद्धि और परिवार की भलाई के लिए यह पूजा की जाती है। इसी पूजा में कलश की स्थापना को भी बहुत खास माना जाता है। इस साल गणेशोत्सव 14 सितंबर से शुरू हुआ था और 25 सितंबर को खत्म होगा। आज शनिवार, 19 सितंबर को गौरी गणपति का विसर्जन है।
डेढ़ दिन, पांच दिन, गौरी गणपति और सात दिन के बाप्पा की मूर्तियों का विसर्जन अलग-अलग दिन किया जाता है। गणपति विसर्जन के बाद बहुत से लोगों के मन में यह सवाल आता है कि कलश, उसमें भरे पवित्र पानी, नारियल और पूजा में इस्तेमाल हुए बाकी सामान का क्या किया जाए। धार्मिक मान्यता के मुताबिक कलश में रखी चीजों को इधर-उधर फेंकने की बजाय आदर के साथ ही उनका इस्तेमाल कर ठिकाने लगाना चाहिए।
गणपति विसर्जन के बाद कलश का पवित्र पानी आम के पत्तों की मदद से पूरे घर में छिड़कना चाहिए, और जो पानी बच जाए उसे किसी गमले या पौधे में डाल देना चाहिए। मान्यता है कि इस पानी को घर में छिड़कने से निगेटिव एनर्जी दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। हालांकि यह पानी तुलसी के पौधे में नहीं डालना चाहिए।
कलश में रखे सिक्के, सुपारी और हल्दी की गांठें शुभ मानी जाती हैं, इसलिए इन्हें तिजोरी या पैसे रखने की जगह पर रख देना चाहिए। धार्मिक मान्यता के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
कलश के ऊपर-नीचे रखे थोड़े से चावल को घर के अनाज में मिला देना चाहिए या पक्षियों को खिला देना चाहिए। पूजा में अक्षत यानी चावल के दाने पवित्र माने जाते हैं, इसलिए इन्हें आदर के साथ इस्तेमाल करने या पक्षियों को खिलाने की परंपरा है।
कलश पर रखा नारियल प्रसाद के तौर पर परिवार के सदस्यों में बांट देना चाहिए। पूजा में इस्तेमाल हुए नारियल को प्रसाद के रूप में घर के लोगों में बांटना शुभ माना जाता है।
कलश में इस्तेमाल हुए आम के पत्ते और दूर्वा को किसी पवित्र पेड़-पौधे की मिट्टी में या विसर्जन की जगह पर विसर्जित कर देना चाहिए। पूजा के सामान को हमेशा आदर के साथ ही ठिकाने लगाने की परंपरा रही है।