बांगलादेश ने भारत से हुए 101 करारों की समीक्षा शुरू की, भारत ने दी सख्त चेतावनी
शेख हसीना के दौर में हुए समझौतों पर ढाका की नई सरकार का फेरआढावा, नई दिल्ली की नजर चित्तगोंग-मोंगला बंदर वाले करारों पर
भारत और बांगलादेश के रिश्तों में एक बड़ा मोड़ आया है। बांगलादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद आई नई सरकार ने माजी प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में भारत के साथ हुए सारे 101 द्विपक्षीय करार और सामंजस्य करार यानी MoUs का पूरा रिव्यू शुरू कर दिया है। इस फैसले के बाद नई दिल्ली में डिप्लोमैटिक हलकों में हलचल मच गई है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पूरे मामले पर बारीकी से नजर रखी हुई है। मंत्रालय ने साफ और सख्त लहजे में ढाका प्रशासन को बता दिया है कि अगर भारत के राष्ट्रीय हित या सुरक्षा को कोई भी नुकसान पहुंचा, तो जरूरी कदम उठाने में भारत पीछे नहीं हटेगा।
तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार ने पिछले कई दशकों में भारत के साथ हुए आर्थिक, मिलिट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े करारों का रिव्यू शुरू किया है। बांगलादेश सरकार के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इस समीक्षा का मकसद करारों में कानूनी खामियां, विसंगतियां और बांगलादेश के लिए नुकसानदायक शर्तें ढूंढना है। ढाका प्रशासन ने यह साफ करने की कोशिश की है कि सारे करार रद्द करने का उनका कोई इरादा नहीं है, बस मौजूदा समझौतों में जरूरी सुधार कर उन्हें देश के हित में ज्यादा असरदार बनाना है। हालांकि इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के जानकारों का मानना है कि यह शेख हसीना के दौर में बने भारत से करीबी रिश्तों और क्षेत्रीय सहयोग को रोकने या उस पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश भी हो सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच बरसों से बना भरोसा हिल सकता है।
इस रिव्यू में सबसे ज्यादा फोकस उन करारों पर है जो नॉर्थ ईस्ट भारत यानी सेवन सिस्टर्स राज्यों के लिए लाइफलाइन जैसे माने जाते हैं। खासकर बांगलादेश के चित्तगोंग और मोंगला बंदरों को भारत के नॉर्थ ईस्ट राज्यों तक माल भेजने के लिए इस्तेमाल करने वाला करार बहुत अहम है, जिससे भारत का समय और खर्च दोनों बचता है। बांगलादेश के चीफ व्हिप नुरुल इस्लाम मोनी समेत कई नेताओं ने इन बंदरों के इस्तेमाल की शर्तों और फीस पर खुलेआम सवाल उठाए हैं। इसके अलावा भारत ने बांगलादेश के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए दी गई अरबों डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट के तहत चल रहे प्रोजेक्ट्स की शर्तों का भी फेरआढावा हो रहा है। अगर इन करारों में उलटे बदलाव हुए, तो इसका सीधा असर भारत के क्षेत्रीय व्यापार और नॉर्थ ईस्ट राज्यों की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि बांगलादेश सरकार ने अभी तक इस रिव्यू प्रोसेस की कोई आधिकारिक जानकारी भारत को नहीं दी है। भारत ने सिर्फ बांगलादेशी और इंटरनेशनल मीडिया की खबरों के आधार पर इन घटनाओं की जानकारी ली है। मंत्रालय की तरफ से यह भी कहा गया, "Nothing has been conveyed to us officially, India will take all necessary actions to protect its interest."
भारतीय डिप्लोमैट्स के मुताबिक भारत और बांगलादेश के बीच सिर्फ कागजी करार नहीं हुए, बल्कि रोड, रेलवे, वॉटरवे, ट्रेड, बिजली सप्लाई और बॉर्डर मैनेजमेंट जैसे सेक्टर्स में एक बड़ा नेटवर्क बना हुआ है। भारत हमेशा बांगलादेश के डेवलपमेंट में पार्टनर बनकर काम करता आया है। लेकिन अगर रिव्यू के नाम पर भारत के स्ट्रैटेजिक, इकॉनॉमिक या बॉर्डर सिक्योरिटी हितों पर चोट पहुंचाने की कोशिश हुई, तो भारत चुप नहीं बैठेगा। भारत अपनी सॉवरेनिटी और नेशनल इंटरेस्ट की रक्षा के लिए जरूरी सारे कानूनी और कूटनीतिक ऑप्शन खुले रखेगा।
भारत और बांगलादेश के रिश्ते सिर्फ दो सरकारों के बीच के रिश्ते नहीं, बल्कि दोनों देशों के भौगोलिक और ऐतिहासिक अस्तित्व से जुड़े हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम से भारत ने बांगलादेश का जो साथ दिया, वह ऐतिहासिक रहा है। लेकिन मौजूदा बांगलादेश सरकार की बदलती पॉलिसी से ट्रेड, एनर्जी सप्लाई और बॉर्डर सिक्योरिटी पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं। आने वाले दिनों में ढाका प्रशासन किन करारों में सुधार का प्रस्ताव रखता है और उस पर भारत की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसी पर साउथ एशिया की शांति और स्थिरता का भविष्य टिका है। अगर बांगलादेश ने जल्दबाजी में एकतरफा फैसले लिए, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों को उठाना पड़ सकता है।