आरती के बाद 'घालीन लोटांगण' क्यों बोला जाता है, जानिए इसका मतलब और महत्व
पूजा-आरती खत्म होने के बाद बोली जाने वाली इस प्रार्थना के पीछे भक्ति और समर्पण की एक पुरानी परंपरा छिपी है।
महाराष्ट्र में ज्यादातर घरों और मंदिरों में आरती पूरी होने के बाद एक प्रार्थना जरूर बोली जाती है, 'घालीन लोटांगण वंदीन चरण'। चाहे गणपति की आरती हो या किसी और देवता की पूजा, आरती के बाद यह प्रार्थना बोलने की रीत बहुत आम है। खास बात यह है कि यह सिर्फ गणपति के लिए बनी प्रार्थना नहीं है, बल्कि इसमें भगवान के आगे पूरी तरह समर्पण का भाव है।
'लोटांगण' का मतलब होता है पूरे शरीर से साष्टांग नमस्कार करना। 'घालीन लोटांगण, वंदीन चरण' कहते वक्त भक्त भगवान के चरणों में पूरी नम्रता के साथ झुकने की इच्छा जताता है। इसके आगे प्रार्थना में भगवान का रूप आंखों से देखने, प्यार से गले लगाने, खुशी से पूजा करने और भक्तिभाव से आरती उतारने जैसी बातें आती हैं। यानी इसमें सिर्फ स्तुति नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच का प्रेम भी झलकता है।
यह पूरी रचना किसी एक व्यक्ति की मानी नहीं जा सकती। जो जानकारी मिलती है उसके मुताबिक शुरुआती मराठी अभंग संत नामदेव की परंपरा से जुड़ा माना जाता है, जबकि इसके बाद आने वाले 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' और 'कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा' जैसे संस्कृत श्लोक पारंपरिक हैं। यानी आज जो प्रार्थना सब मिलकर बोलते हैं, वह असल में अलग-अलग रचनात्मक परंपराओं का मेल है।
आरती के दौरान भगवान की स्तुति और पूजा होती है। इसके बाद 'घालीन लोटांगण' में भक्त अपना शरीर, मन, वाणी और कर्म भगवान को सौंपने का भाव जताता है। 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' में कहा जाता है कि भगवान ही हमारी मां, पिता, भाई, दोस्त और सब कुछ हैं। आगे यह भी कहा जाता है कि किए गए सारे कर्म नारायण को अर्पित किए जाते हैं। इसी वजह से यह प्रार्थना आरती के बाद भक्ति के समापन जैसा काम करती है।
इस प्रार्थना के केंद्र में नम्रता और समर्पण ही है। आरती के बाद सब मिलकर जब यह प्रार्थना बोलते हैं, तो भक्तों का ध्यान भगवान के चरणों और उनके साथ अपने रिश्ते पर टिक जाता है। इससे पूजा सिर्फ एक रस्म नहीं रह जाती, बल्कि मन की श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मसमर्पण जताने का पल बन जाती है। महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में इसी वजह से 'घालीन लोटांगण' को खास जगह मिली है।