थायलंड में ब्रिटिश नागरिक बने सबसे बड़े पद पर पहुंचने वाले पहले विदेशी भिक्षु
भारत से शुरू हुई पांच दशक की बौद्ध साधना के बाद ब्रिटिश नागरिक शॉन चिव्हर्टन को थायलंड में सर्वोच्च सम्मान मिला।
भगवान बुद्ध की शिक्षाओं की खोज में भारत आए एक ब्रिटिश नागरिक को पांच दशक बाद थायलंड के बौद्ध जगत में ऐतिहासिक जगह मिली है। ६८ साल के शॉन चिव्हर्टन, जिन्हें अब अजान जयसारो के नाम से जाना जाता है, को Somdet Phra Rachakhana पद पर नियुक्त किया गया है।
यह थायलंड के बौद्ध श्रेणीक्रम में दूसरा सबसे बड़ा पद माना जाता है। इस पद तक पहुंचने वाले वे थायलंड के इतिहास में पहले ऐसे भिक्षु हैं जिनका जन्म किसी और देश में हुआ।
शॉन चिव्हर्टन का जन्म १९५८ में इंग्लैंड के आयल ऑफ वाइट में हुआ था। जवानी में जिंदगी के मतलब और इंसानी दुख से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढते हुए उन्होंने कई देशों की यात्रा की। १९७० के दशक के आखिर में वे भारत आए और यहां भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया।
इसके बाद उनका सफर थायलंड की तरफ मुड़ा। १९७८ में वे मशहूर बौद्ध गुरु लुआंग फो चा की शिष्य परंपरा से जुड़ गए। आगे चलकर उन्होंने थायलंड की वनपरंपरा वाली बौद्ध साधना अपनाई और अध्यात्म, ध्यान और बौद्ध शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी।
अजान जयसारो ने कई सालों तक थाई और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बौद्ध धर्म से जुड़ा लेखन और अध्यापन किया। उनके इस काम को देखते हुए उन्हें पहले भी अलग-अलग धार्मिक पदवियां दी जा चुकी थीं। साल २०२० में उन्हें थाई नागरिकता मिली, जिसके बाद उनके धार्मिक करियर में और भी अहम जिम्मेदारियां मिलती गईं।
१४ जुलाई २०२६ को थायलंड के राजाज्ञा के जरिए आठ वरिष्ठ भिक्षुओं को Somdet Phra Rachakhana पद पर बढ़ावा दिया गया। इस लिस्ट में अजान जयसारो का नाम भी शामिल था। इस नियुक्ति के साथ ही विदेश में जन्मे किसी व्यक्ति के थायलंड की बौद्ध श्रेणी में इतने ऊंचे पद तक पहुंचने का यह पहला रिकॉर्ड बना।
अजान जयसारो का सफर सिर्फ एक धार्मिक पद तक पहुंचने भर का नहीं है। ब्रिटेन से भारत और फिर थायलंड, यह उनकी करीब पांच दशक की आध्यात्मिक यात्रा रही है। थायलंड में रहते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म की ध्यान, अनुशासन और साधना की परंपरा से खुद को पूरी तरह जोड़ लिया।
उनकी इस नियुक्ति से थायलंड की बौद्ध परंपरा का अंतरराष्ट्रीय विस्तार भी सामने आया है। विदेश में जन्मे किसी व्यक्ति का थाई बौद्ध व्यवस्था के इतने प्रतिष्ठित पद तक पहुंचना इस परंपरा की एक ऐतिहासिक घटना माना जा रहा है।