शक्तीपीठ महामार्ग: जमीन देने वाले किसानों को मुआवजे के नए नियम जारी, विरोध भी जारी
पवनार से पत्रादेवी तक बनने वाले शक्तीपीठ महामार्ग के लिए महाराष्ट्र सरकार ने भूसंपादन और मुआवजे की नई नियमावली जारी कर दी है, जबकि कई गांवों में इसका विरोध बना हुआ है।
नागपुर से गोवा, यानी पवनार से पत्रादेवी तक बनने वाले शक्तीपीठ महामार्ग के लिए महाराष्ट्र सरकार ने भूसंपादन की नई मार्गदर्शक नियमावली आधिकारिक तौर पर जारी कर दी है। कई गांवों के लोगों ने इस नई नियमावली का विरोध किया है, और प्रोजेक्ट के कुछ हिस्सों में इसे लेकर काफी नाराजगी देखी जा रही है। यही वजह है कि सरकार ने जमीन देने वालों के लिए मुआवजे के मापदंड और कुछ नियम साफ-साफ बता दिए हैं। यह मुआवजा भूसंपादन, पुनर्वसन और पुनर्स्थापन कानून 2013 और महाराष्ट्र महामार्ग अधिनियम कानून 1955 के प्रावधानों के मुताबिक दिया जाएगा। नागपुर और गोवा के बीच शक्तीपीठ महामार्ग की लंबाई 856 किलोमीटर बताई जा रही है। सोलापुर और सांगली जैसे जिलों में इस प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा है, और जिन किसानों की जमीन इस महामार्ग में जाएगी, उनके लिए मुआवजे के मापदंड तय किए गए हैं।
राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए नई जमीन संपादन नियमावली जारी की है। इसके तहत प्रभावित किसानों को भूसंपादन पुनर्स्थापना कानून 2013 और महाराष्ट्र अधिनियम 155 के मुताबिक मुआवजा मिलेगा। जमीन के बाजार मूल्य के हिसाब से, यानी रेडी रेकनर दर के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में अधिकतम चार गुना तक और शहरी इलाकों में दोगुना मुआवजा मिलेगा। शहरी या निमशहरी इलाके के लिए दो गुना मुआवजा देने का प्रावधान रखा गया है। भूसंपादन प्रक्रिया के नियमों के मुताबिक जमीन मालिकों को 12 प्रतिशत अतिरिक्त रकम देने का प्रावधान भी लागू हो सकता है।
यह जरूरी नहीं कि हर किसान को एक जैसा और सीधा चार गुना मुआवजा मिल जाए। उस किसान की जमीन किस तरह की है, उस जमीन पर लागू बाजार भाव और गुणांक (मल्टिप्लायर), इन बातों पर ही अंतिम फैसला निर्भर करेगा। इस पूरी भूसंपादन और मुआवजा प्रक्रिया के लिए करीब 35 सरकारी निर्णयों (जीआर) का सहारा लिया जाएगा। इसमें संयुक्त मापी, जमीन का मूल्यांकन, पोटखराब जमीन, 12 प्रतिशत अतिरिक्त रकम, गैर-खेती जमीन और पेड़ों तथा फसलों के मूल्यांकन जैसे अहम पड़ाव शामिल हैं।
अगर कोई किसान महामार्ग अधिनियम के मुताबिक तय की गई मुआवजा रकम से सहमत नहीं है, तो सरकार ने उसे लवाद यानी आर्बिट्रेशन के पास अपील करने का कानूनी अधिकार दिया है। इसके साथ ही, जमीन अधिग्रहित होने के बाद महामार्ग प्राधिकरण को निर्माण कार्य के लिए उस जमीन में प्रवेश करने का प्रावधान भी इस नियमावली में रखा गया है।