गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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10:13 IST

कॉटन शर्ट बनाने में 2700 लीटर पानी खर्च, फास्ट फैशन का पानी और प्रदूषण से जुड़ा हिसाब सामने

नए कपड़े खरीदते वक्त कीमत, ब्रांड और डिजाइन दिखता है, लेकिन उसके पीछे खर्च हुए पानी का हिसाब शायद ही कोई लगाता है।

कॉटन शर्ट बनाने में 2700 लीटर पानी खर्च, फास्ट फैशन का पानी और प्रदूषण से जुड़ा हिसाब सामने
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

नए कपड़े खरीदते वक्त हमें कीमत, ब्रांड और डिजाइन दिखता है, लेकिन उस कपड़े के पीछे खर्च हुए पानी का हिसाब शायद ही कभी लगाया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 250 ग्राम वजन का एक कॉटन शर्ट बनाने में तकरीबन 2,700 लीटर पानी खर्च हो सकता है। इसमें कपास उगाने में लगने वाला पानी और उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ा पानी, दोनों शामिल हैं। यह कोई तय आंकड़ा नहीं है, संबंधित इलाके और खेती के तरीके के हिसाब से यह घटता-बढ़ता रह सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में फास्ट फैशन और अब तेजी से बढ़ रहे अल्ट्रा फास्ट फैशन पर गौर करना जरूरी हो जाता है। सोशल मीडिया के ट्रेंड, सस्ती कीमतें और लगातार बदलते डिजाइन ग्राहकों के मन में यह भावना पैदा कर सकते हैं कि "यह तो अब पुराना हो गया" या "एक बार पहने कपड़े दोबारा पहनना शर्म की बात है"। कंपनियां ग्राहकों की पसंद, ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं और ट्रेंड का अध्ययन करके नए डिजाइन तेजी से बाजार में उतारती हैं। मिसाल के तौर पर, जारा की मूल कंपनी इंडिटेक्स का कहना है कि उसके स्टोर में हफ्ते में दो बार नए प्रोडक्ट आते थे।

फैशन में नयापन खुद ही बिक्री का एक अहम हिस्सा बन जाता है। "नया कलेक्शन", सीमित उपलब्धता, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और लगातार बदलते ट्रेंड की वजह से खरीदारी की जल्दबाजी बढ़ जाती है। इसे सिर्फ कंपनियों की गलती कहना ठीक नहीं होगा, ग्राहकों की मांग भी इस बिजनेस मॉडल को आकार देती है। इंडिटेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक ग्राहकों की पसंद और प्रतिक्रियाओं के आधार पर ही नई चीजें बनाई जाती हैं।

कॉटन में जहां पानी की बड़ी समस्या है, वहीं पॉलिएस्टर, नायलॉन और एक्रिलिक जैसे सिंथेटिक फाइबर के सामने पर्यावरण से जुड़ी अलग ही चुनौती है। यह प्लास्टिक आधारित धागे कपड़े धोने के दौरान सूक्ष्म प्लास्टिक फाइबर छोड़ते हैं। UNEP की जानकारी के मुताबिक, सिंथेटिक टेक्सटाइल से निकलने वाले माइक्रोफाइबर समुद्री माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण में 16 फीसदी से 35 फीसदी तक का हिस्सा दे सकते हैं। टेक्सटाइल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले रंग, प्रोसेसिंग केमिकल और गंदा पानी भी प्रदूषण की एक और वजह बनते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि ग्राहक को क्या सोचना चाहिए। हर कॉटन शर्ट बुरा है या हर सिंथेटिक कपड़ा गलत है, ऐसा सीधा नतीजा नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यह सवाल जरूर मायने रखते हैं कि कपड़ा कितने समय तक इस्तेमाल होगा, कितनी बार धोया जाएगा, वह टिकाऊ है या नहीं, और क्या बिना जरूरत के ही उसे खरीदा जा रहा है। फास्ट फैशन की रफ्तार के बजाय कपड़े की उम्र बढ़ाना, उसे दोबारा इस्तेमाल करना और जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी करना, पर्यावरण पर असर कम करने और जेब को राहत देने का बेहतर रास्ता साबित हो सकता है।

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