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22:43 IST

कच्चे तेल में उबाल, $१२० प्रति बैरल तक भाव जाने का डर, महंगाई की आशंका

मिडल ईस्ट में तनाव और सप्लाई की दिक्कतों से क्रूड ऑइल के दाम फिर बढ़े

कच्चे तेल में उबाल, $१२० प्रति बैरल तक भाव जाने का डर, महंगाई की आशंका
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

कच्चे तेल के दामों ने एक बार फिर दुनिया भर में टेंशन बढ़ा दी है। मिडल ईस्ट में चल रहे तनाव और तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच क्रूड ऑइल की कीमत प्रति बैरल १०० डॉलर के पार निकल गई है। बुधवार, १६ सितंबर को ब्रेंट क्रूड का भाव प्रति बैरल १०७ से १०९ डॉलर के बीच रहा। हालांकि अमेरिका में कच्चे तेल का स्टॉक बढ़ने की वजह से दाम थोड़े नरम भी हुए हैं।

बाजार की टेंशन अभी खत्म नहीं हुई है। अगर मिडल ईस्ट में सप्लाई से जुड़ी दिक्कतें बनी रहीं, तो कच्चे तेल का भाव प्रति बैरल १२० डॉलर तक पहुंचने की आशंका है। इससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

कच्चे तेल के दाम बढ़ने की सबसे बड़ी वजह सप्लाई को लेकर चिंता है। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमले की वजह से इस रूट पर तेल की आवाजाही बाधित हुई है। इतना ही नहीं, यानबू बंदरगाह पर तेल भरने का काम भी रोक दिया गया है। सऊदी तेल को लाल सागर तक पहुंचाने के लिए यह पाइपलाइन एक अहम रास्ता है। इसके इस्तेमाल से सऊदी तेल को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की जरूरत कम हो जाती है। इस रूट में आई रुकावट से बाजार में सप्लाई को लेकर डर बढ़ गया है, और अगर यह रुकावट बनी रही तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल के दाम और बढ़ सकते हैं।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है। इसका सीधा असर यह होता है कि इंटरनेशनल बाजार में कच्चे तेल का भाव बढ़ने से देश के तेल आयात बिल पर सीधा फर्क पड़ता है। सीधी भाषा में कहें तो भारत को विदेश से एक बैरल तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा, और अगर तेल के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रहे तो सरकार और तेल कंपनियों पर भी दबाव आ सकता है। हाल ही में भारत के क्रूड बास्केट की कीमत में भी बड़ी बढ़ोतरी हुई है। भारतीय क्रूड बास्केट का भाव २ सितंबर को करीब ९९.३५ डॉलर से बढ़कर १४ सितंबर को १२८.७ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

जब कच्चे तेल का भाव १२० डॉलर पर पहुंचता है, तो अगले ही दिन पेट्रोल-डीजल के दाम एक साथ बढ़ जाना जरूरी नहीं है। भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कई चीजों पर निर्भर करते हैं। कच्चे तेल की कीमत के अलावा डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, रिफाइनिंग का खर्च, टैक्स और तेल कंपनियों का मार्जिन भी देखा जाता है। इसके अलावा, तेल कंपनियां इंटरनेशनल बाजार में रोज होने वाले बदलाव को हमेशा उसी दिन पेट्रोल-डीजल के दाम में शामिल नहीं करतीं। अगर कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहे, तो दाम बढ़ने का दबाव आगे और बढ़ सकता है।

अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक करीब १२० डॉलर पर टिकी रही, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। डीजल के दाम बढ़ने से ट्रक, बस और दूसरी मालवाहक गाड़ियों का खर्च बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर एक जगह से दूसरी जगह माल पहुंचाने की लागत पर पड़ता है। इसके बाद कंपनियां अपने खर्च का कुछ हिस्सा अपने प्रोडक्ट्स के दाम में जोड़ सकती हैं। यानी महंगे कच्चे तेल की वजह से ट्रांसपोर्ट से लेकर रोजमर्रा के सामान तक हर चीज पर महंगाई का दबाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है। इसके अलावा एयरलाइन कंपनियों का फ्यूल खर्च भी बढ़ता है, जिससे महंगे तेल की वजह से हवाई किराया भी महंगा हो सकता है।

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