गुरूवार, 17 सितमबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
12:36 IST

गोंडवाना महाखंड धरती के 80 फीसदी हिस्से में फैला था, नई स्टडी में खुलासा

एआई और 25 हजार से ज्यादा प्राचीन चट्टानों के सैंपल की मदद से वैज्ञानिकों ने गोंडवाना महाखंड के आकार को लेकर पुरानी धारणा को गलत साबित कर दिया है।

गोंडवाना महाखंड धरती के 80 फीसदी हिस्से में फैला था, नई स्टडी में खुलासा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

करोड़ों साल पहले धरती पर कई बड़े-बड़े महाखंड बने और फिर टूटकर बिखर गए। इन्हीं में से एक बेहद अहम और विशाल भूभाग था गोंडवाना। भारतीय उपमहाद्वीप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, अंटार्क्टिका और ऑस्ट्रेलिया, ये सारे देश कभी इसी गोंडवाना का हिस्सा हुआ करते थे। साइंस एडवांसेस नाम की मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका में हाल ही में छपे एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों ने गोंडवाना की बनावट को लेकर एक चौंकाने वाला और क्रांतिकारी खुलासा किया है।

भूगर्भशास्त्रियों को गोंडवाना की पुरानी सीमाओं के अहम सबूत मिले हैं। अब तक दुनिया भर के वैज्ञानिक यही मानते आए थे कि गोंडवाना ने उस समय की धरती के कुल भूभाग का सिर्फ दो-तिहाई हिस्सा, यानी करीब 65 फीसदी हिस्सा घेरा था। लेकिन नई रिसर्च से साफ हुआ है कि 80 करोड़ से 50 करोड़ साल पहले जो गोंडवाना महाखंड मौजूद था, उसने धरती के कुल भूभाग का पूरे 80 फीसदी हिस्सा घेर रखा था।

यह बड़ा खुलासा डीप-टाइम डिजिटल अर्थ नाम के एक इंटरनेशनल वैज्ञानिक ग्रुप ने किया है। चायनीज अकैडमी ऑफ जियोलॉजिकल साइंसेज के प्रोफेसर ताओ वांग और कर्टिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम कॉलिन्स की अगुवाई वाली टीम ने दुनिया भर से 25 हजार से ज्यादा प्राचीन मैग्मैटिक चट्टानों के सैंपल इकट्ठा किए।

भूगर्भीय हलचलों की वजह से लाखों-करोड़ों साल में गोंडवाना के टुकड़े दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों और पहाड़ों में बिखर गए थे। ये चट्टानें आखिर कब और किन हालात में बनीं, इसका पता लगाने के लिए रिसर्चरों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई और एडवांस डेटाबेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया। एआई की मदद से इन चट्टानों की असली लोकेशन तय की गई और प्राचीन धरती का एक डिजिटल नक्शा तैयार किया गया।

इस नक्शे को बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने समैरियम और नियोडाइमियम नाम के तत्वों के आइसोटोप का इस्तेमाल किया। ये आइसोटोप गोंडवाना की मूल चट्टानों के लिए एक तरह का "केमिकल सिग्नेचर" या "फिंगरप्रिंट" का काम करते हैं। इस रिसर्च के मुख्य लेखक कॉलिन्स ने इस समैरियम-नियोडाइमियम आइसोटोपिक नक्शे को "अतीत में ले जाने वाली टाइम मशीन" बताया है। सिर्फ 2 करोड़ साल पहले बने नए पहाड़ों में छिपी 50 करोड़ साल पुरानी चट्टानों को पहचानना इसी फिंगरप्रिंट तकनीक की बदौलत मुमकिन हो पाया।

इस रिसर्च का सबसे अहम पहलू यह है कि गोंडवाना के बनने और धरती पर जीवसृष्टि के विकास के बीच सीधा रिश्ता निकलकर सामने आया है। करीब 53.8 करोड़ साल पहले धरती पर "कैम्ब्रियन विस्फोट" हुआ था, जिस दौर में अचानक तरह-तरह के जटिल और बड़े जीव उभरने लगे। इससे पहले अरबों साल तक धरती पर सिर्फ साधारण सूक्ष्मजीव ही मौजूद थे।

गोंडवाना महाखंड बनने के दौरान धरती के करीब 79 फीसदी घेरे में जबरदस्त भूगर्भीय हलचलें हुईं और एक प्राचीन "रिंग ऑफ फायर" यानी आग का घेरा बन गया। इस रिंग ऑफ फायर में लगातार होते ज्वालामुखी विस्फोटों से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और पानी की भाप जैसी गैसें भारी मात्रा में निकलीं। इसी वजह से बेहद ठंडी रही धरती गर्म हुई, और इसी बदलते मौसम की वजह से धरती पर जटिल जीवसृष्टि फलने-फूलने लायक माहौल तैयार हुआ।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे