ग्लोबल हॉस्पिटल में रिजर्व बेड की शर्त का उल्लंघन, 100 करोड़ के नुकसान पर समझौते का आरोप
परेल के ग्लेनईगल्स ग्लोबल हॉस्पिटल को ज्यादा बांधकाम एरिया देने के बदले जो 15 प्रतिशत बेड गरीब मरीजों के लिए रिजर्व रखने की शर्त लगाई गई थी, उसका 14 साल से पालन नहीं हुआ, ऐसा आरोप है। मामले को मुश्किल से 15 से 20 करोड़ में निपटाने की कोशिश की शिकायत मुख्यमंत्री और महापालिका आयुक्त से की गई है।
मुंबई के परेल इलाके में मौजूद जाने-माने ग्लेनईगल्स ग्लोबल हॉस्पिटल को साल 2012 में ज्यादा चटईक्षेत्र यानी एफएसआई मंजूर किया गया था। इसके बदले हॉस्पिटल को यह शर्त पूरी करनी थी कि कुल बेड में से 15 प्रतिशत बेड महापालिका की तरफ से भेजे गए और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए रिजर्व रखे जाएंगे। आरोप है कि यह शर्त पिछले 14 साल से सुनियोजित तरीके से तोड़ी जा रही है।
इस मामले में मुंबई महापालिका को करीब 100 से 150 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है, ऐसी शिकायत है। इसके बावजूद हॉस्पिटल प्रशासन के साथ मामले को सिर्फ 15 से 20 करोड़ रुपये में निपटाने की कोशिश शुरू है, ऐसी शिकायत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और महापालिका आयुक्त को की गई है।
यह मुद्दा आयुष्मान भारत योजना की मुंबई उपनगर जिला संनियंत्रण व शिकायत निवारण समिति के राज्य सचिव वकील भीमेश मुतुला ने उठाया है। उनकी मांग है कि जब तक पुराना हिसाब पूरा नहीं होता, तब तक हॉस्पिटल के साथ कोई नया करार नहीं किया जाना चाहिए। मिली जानकारी के मुताबिक, साल 2012 में ग्लोबल हॉस्पिटल को लगभग 9,357 वर्ग मीटर एक्सट्रा बांधकाम एरिया मंजूर हुआ था, और इसी छूट के बदले 15 प्रतिशत बेड रिजर्व रखने की शर्त लगाई गई थी।
मुतुला का कहना है कि इस पूरे गड़बड़झाले में सिर्फ हॉस्पिटल प्रशासन ही नहीं, बल्कि नियमों का उल्लंघन होते देखकर भी बार-बार परमिशन देने वाले महापालिका अफसरों की भूमिका भी बहुत संदेह के दायरे में है। उन्होंने मांग की है कि जरूरत पड़ने पर इस मामले को आर्थिक अपराध शाखा को सौंपा जाए। साथ ही यह भी साफ चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन अपने स्तर पर नया करार करने की कोशिश करता है, तो तीव्र धरना आंदोलन किया जाएगा।
साल 2012 से अब तक इन रिजर्व बेड का फायदा असल में कितने सामान्य मरीजों को मिला, और महापालिका की सिफारिश पर कितने मरीजों का सस्ती दर पर इलाज हुआ, इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुतुला की मांग है कि पूरे इस दौर की खास फॉरेंसिक ऑडिट यानी न्यायवैद्यक आर्थिक जांच करवाकर गहराई से पड़ताल की जाए।
मुतुला का आरोप है कि एक तरफ महापालिका के खजाने और गरीब मरीजों का करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है, और दूसरी तरफ सिर्फ थोड़ी सी रकम में यह मामला दबाकर संबंधित लोगों को क्लीन चिट देने की तैयारी चल रही है। उनके मुताबिक यह सीधे-सीधे पब्लिक हित और टैक्सपेयर्स के पैसे के साथ धोखा है।