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धनुष्यबाण केसः शिंदे गुट के वकील कौल बोले, विधायक-सांसदों की अलग भूमिका यानी पार्टी में फूट

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना चिन्ह मामले में शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल का दावा, उद्धव ठाकरे के फैसले से अलग रुख रखने वाले विधायक-सांसद ही असली राजनीतिक फूट की निशानी हैं।

धनुष्यबाण केसः शिंदे गुट के वकील कौल बोले, विधायक-सांसदों की अलग भूमिका यानी पार्टी में फूट
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

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शिवसेना पार्टी और धनुष्यबाण चिन्ह को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। शिंदे गुट की तरफ से सीनियर वकील नीरज किशन कौल ने कोर्ट में जोरदार दलील रखी। कौल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग ने जो फैसला दिया, वह बिलकुल सही है और इससे संविधान का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। यह बात उन्होंने कोर्ट के सामने साफ शब्दों में रखी।

इससे पहले ठाकरे गुट के सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में एक अहम मुद्दा उठाया था। सिब्बल का कहना था कि विधानमंडल में हुई फूट को पार्टी की फूट नहीं माना जा सकता। नीरज किशन कौल ने कोर्ट में इसी दलील को सिरे से खारिज कर दिया।

कौल के मुताबिक, उद्धव ठाकरे ने पार्टी की विचारधारा से हटकर कांग्रेस के साथ जाने का फैसला लिया था। उसी वक्त शिवसेना के कई विधायक और सांसदों ने इससे अलग रुख अपनाया। कौल का कहना है कि यही अलग राजनीतिक भूमिका असल में पार्टी के भीतर की राजनीतिक फूट है। उन्होंने यह भी दलील दी कि पार्टी और चिन्ह को लेकर फैसला लेने का पूरा अधिकार चुनाव आयोग के पास है।

कौल ने कोर्ट में यह भी कहा कि सिर्फ पार्टी में दो अलग गुट बन जाने भर से राजनीतिक विवाद साबित नहीं होता। लेकिन अगर विधायक और सांसद अलग रुख अपना रहे हैं, अलग से बैठकें कर रहे हैं और अलग-अलग प्रस्ताव पास कर रहे हैं, तो इससे साफ हो जाता है कि पार्टी के भीतर आंतरिक संघर्ष चल रहा है।

कौल ने कोर्ट में शिवसेना की पार्टी संविधान पर भी बात रखी। उनका कहना था कि 'पक्षप्रमुख' पद 2018 में बना, यह दावा गलत है, यह पद असल में 2013 में ही बन चुका था। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि संविधान की धारा 324 के तहत चुनाव आयोग के पास काफी व्यापक अधिकार हैं।

शिंदे गुट का कहना है कि चुनाव आयोग के सामने जाने से पहले दोनों तरफ से अलग-अलग प्रस्ताव पास किए गए थे, अलग बैठकें हुई थीं और एक-दूसरे को अपात्र ठहराने की मांगें भी उठाई गई थीं। इस वजह से यह मामला सिर्फ विधानमंडल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका दायरा पूरी पार्टी तक फैल गया था। अब इस केस में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या आता है, इस पर महाराष्ट्र के पूरे राजनीतिक हलके की नजर टिकी हुई है।

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