गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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03:49 IST

यमन संकट: हुथी बंडखोरों के आगे सऊदी क्राउन प्रिंस घिरे, ट्रम्प से मदद मांगी पर अमेरिका ने कर दिया इनकार

मोचा शहर पर हुथी कब्जे के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रम्प को फोन कर हवाई हमले की मांग की, अमेरिका ने सीधे हमले से इनकार कर सिर्फ खुफिया मदद देने का फैसला किया

यमन संकट: हुथी बंडखोरों के आगे सऊदी क्राउन प्रिंस घिरे, ट्रम्प से मदद मांगी पर अमेरिका ने कर दिया इनकार
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मिडल ईस्ट में फौजी और सियासी तनाव दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। यमन में ईरान समर्थित हुथी बंडखोरों ने अपना दबदबा और बढ़ाते हुए अहम शहर मोचा (Mokha) को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया है। हुथियों की इस आक्रामक कार्रवाई की वजह से सऊदी अरब के साथ लड़ रही यमनी फौज को पीछे हटना पड़ा है। हुथी लड़ाके तेजी से दक्षिण की तरफ बढ़ रहे हैं, जिससे सऊदी अरब की सुरक्षा और उसकी सीधी सीमा को बड़ा खतरा पैदा हो गया है।

हालात कितने गंभीर हो चुके हैं, यह भांपते हुए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने सीधे वॉशिंगटन से संपर्क साधा। एमबीएस ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को एक ही दिन में दो बार फोन किया। पहले फोन में उन्होंने यमन के बिगड़ते हालात की जानकारी दी और कुछ घंटों बाद दोबारा फोन कर हुथी बंडखोरों पर अमेरिका से सीधे हवाई और मिसाइल हमले करने की जोरदार मांग रखी।

एमबीएस की इतनी अहम और तुरंत की मांग के बावजूद ट्रम्प ने हुथियों पर सीधी फौजी कार्रवाई करने से साफ इनकार कर दिया। अमेरिकी प्रशासन के बड़े अधिकारियों के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन फिलहाल इस इलाके में कोई नया जंग का मोर्चा नहीं खोलना चाहता। अमेरिका की पहली प्राथमिकता होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित रखना और ईरान की हरकतों पर नजर रखना है।

ट्रम्प ने भले सीधे हवाई हमले करने से परहेज किया हो, लेकिन सऊदी अरब को पूरी तरह अकेला भी नहीं छोड़ा है। अमेरिका ने सऊदी फौज को हुथियों के ठिकानों की खुफिया जानकारी (टारगेटिंग और इंटेलिजेंस डेटा) देने पर सहमति जताई है। इसके अलावा फिलहाल करीब 200 अमेरिकी फौजी जवान सऊदी अरब में मौजूद हैं, जो सीधे जंग में शामिल हुए बिना सिर्फ तकनीकी और खुफिया मदद दे रहे हैं।

मोचा शहर कब्जे में लेने के बाद हुथी बंडखोरों का अगला निशाना बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य (Bab el-Mandeb Strait) है। यह समुद्री रास्ता पूरी दुनिया के लिए बेहद संवेदनशील और अहम माना जाता है। दुनिया के कुल समुद्री कारोबार का करीब 12 फीसदी इसी संकरे रास्ते से होता है। इसके अलावा सऊदी अरब के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से लाल सागर में एक्सपोर्ट किया जाता है।

ईरान पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर दबाव बना रहा है। ऐसे में अगर हुथियों का बाब अल-मंदब पर पूरा कंट्रोल हो गया, तो ईरान और उसके साथी देशों के हाथ में दुनिया की ईंधन सप्लाई रोकने का एक बड़ा हथियार आ जाएगा। इसी वजह से इंटरनेशनल मार्केट में तेल के दाम भड़क गए हैं और इसका बुरा असर ग्लोबल इकॉनमी पर भी दिख रहा है।

इससे पहले सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए इलाके के मुस्लिम देशों से मदद लेने की कोशिश की थी। मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की से फौजी मदद मांगी थी, मगर दोनों देशों ने यमन की इस जंग में सीधे फौज भेजने या दखल देने से इनकार कर दिया। साथी देशों के पीठ फेर लेने की वजह से ही सऊदी अरब को एक बार फिर अमेरिका का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

हालात का जायजा लेने और तुरंत बातचीत के लिए अमेरिका की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर गुरुवार को फौरन सऊदी अरब पहुंचे। उन्होंने सऊदी फौजी अधिकारियों के साथ बंद कमरे में अहम बैठकें कीं। ट्रम्प प्रशासन भले सीधा हमला नहीं कर रहा, मगर सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, यह इससे साफ जाहिर होता है।

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