TMC का नाम-चिन्ह चुनाव आयोग ने फ्रीज किया, ममता बॅनर्जी के हाथ से बना निशान अटका
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े के बीच चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और फूल-घास वाला निशान अस्थायी तौर पर फ्रीज कर दिया है।
पिछले तीन दशक से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और उसका चुनाव चिन्ह पश्चिम बंगाल की राजनीति की पहचान बना हुआ है। लेकिन पार्टी के अंदर संगठनात्मक विवाद इतना बढ़ गया कि चुनाव आयोग को 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फूल और घास' वाला चिन्ह अस्थायी रूप से फ्रीज करना पड़ा। आयोग के इस फैसले के बाद अब कोई भी प्रतिद्वंद्वी गुट आयोग की मंजूरी के बिना इस चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यानी टीएमसी में जब से फूट पड़ी है, तब से कोई भी गुट इसे इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। तीस साल से टीएमसी की पहचान रहे इस चिन्ह की कहानी भी दिलचस्प है।
TMC की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, पार्टी की स्थापना के वक्त ममता बैनर्जी ने खुद यह चिन्ह अपने हाथों से बनाया था। दो हरी फूलों की कलियां और नीचे घास, यही आगे चलकर तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बन गया।
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी 1998 को हुई थी। ममता बैनर्जी कांग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी खुद की पार्टी लेकर आई थीं। मकसद था बंगाल के लिए एक अलग और नया राजनीतिक मंच खड़ा करना। पार्टी बनने के बाद उसे एक अलग पहचान की जरूरत थी, और आज जिसे 'फूल और घास' के नाम से जाना जाता है, उस चुनाव चिन्ह की कहानी यहीं से शुरू होती है।
वेबसाइट के मुताबिक पार्टी की स्थापना के दिन ममता बैनर्जी ने खुद यह निशान बनाया था, जिसमें घास से उगती दो हरी कलियां दिखाई गई हैं। इस चिन्ह को एकता और मेल मिलाप के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। टीएमसी की वेबसाइट पर काजी नजरुल इस्लाम की एक पंक्ति 'मोरा एक वृंते दुई कुसुम हिंदू मुस्लिम' का भी हवाला दिया गया है, जिसका मतलब है एक ही डंठल पर दो फूल, जो हिंदू मुस्लिम एकता को दर्शाते हैं। पार्टी के आधिकारिक स्पष्टीकरण के मुताबिक यह चिन्ह सिर्फ एक चुनाव निशान नहीं है, बल्कि इससे एकता और धर्मनिरपेक्षता का संदेश दिया जाता है।
"तृणमूल" शब्द का मतलब है "जड़ें" या "जमीनी स्तर यानी आम आदमी से जुड़ा हुआ", और इसी वजह से चुनाव चिन्ह में घास को खास जगह दी गई। कई पुरानी रिकॉर्डिंग में भी टीएमसी के चुनाव चिन्ह का जिक्र दो फूल और घास के तौर पर मिलता है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में इस चिन्ह का आधिकारिक नाम "फूल और घास" दर्ज है, और आयोग से जुड़े एक दस्तावेज में यही चिन्ह अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम के तहत सूचीबद्ध है।
1998 से यह चिन्ह टीएमसी की चुनावी पहचान रहा है, लेकिन 2026 तक आते आते पार्टी के अंदरूनी झगड़े की वजह से यह विवाद के केंद्र में आ गया। मौजूदा विवाद में दो प्रतिद्वंद्वी गुट पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने सितंबर 2026 में दोनों पक्षों की बात सुनी और 17 सितंबर को एक अंतरिम आदेश जारी किया। आयोग ने कहा कि उसके सामने दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं, और दोनों ही खुद को तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं।
यह मामला चुनाव आयोग के 'चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत आता है। ऐसे विवाद में आयोग को तय करना होता है कि कौन सा गुट मान्यताप्राप्त पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन उपचुनाव चल रहे होने की वजह से आयोग के पास अंतिम फैसला लेने का पर्याप्त वक्त नहीं था, इसलिए एक अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों गुटों को उनका पुराना नाम और चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने से रोक दिया गया।
दोनों पक्षों को प्राथमिकता के हिसाब से तीन तीन वैकल्पिक नाम और तीन तीन खाली चुनाव चिन्ह सुझाने को कहा गया है, जिसके बाद दोनों गुटों को अलग अलग नाम और अलग अलग चुनाव चिन्ह दिए जाएंगे। इस आदेश का सीधा मतलब यह है कि ममता बैनर्जी के बनाए हुए निशान पर फिलहाल कोई दावा नहीं कर सकता, चाहे वह खुद ममता बैनर्जी का गुट हो या प्रतिद्वंद्वी ऋतब्रता बैनर्जी का गुट। साफ शब्दों में कहें तो चुनाव आयोग ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि असली टीएमसी कौन है, यह सिर्फ उपचुनावों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है। पैराग्राफ 15 के तहत आगे की सुनवाई और कागजात की जांच के बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा।
1998 में जब तृणमूल कांग्रेस बनी थी, तब ममता बैनर्जी ने पार्टी के लिए ऐसा चुनाव चिन्ह चुना था जो पार्टी के नाम और आम आदमी वाली राजनीतिक छवि से मेल खाता था। करीब 28 साल बाद अब वही चिन्ह पार्टी के सबसे बड़े संगठनात्मक विवाद के केंद्र में है। फिलहाल आयोग ने बस इतना तय किया है कि अंतिम फैसला होने तक दोनों पक्ष 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फूल और घास' चिन्ह इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
पार्टी चिन्हों पर विवाद चुनाव आयोग के लिए नया नहीं है। भारतीय राजनीति में पार्टी टूटने के बाद नाम और चिन्ह को लेकर कई बड़े विवाद हो चुके हैं। 2017 के एआईएडीएमके विवाद में भी दोनों गुटों को पार्टी का मूल नाम और 'दो पत्तियां' चिन्ह इस्तेमाल करने पर अस्थायी रोक लगाई गई थी।