गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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03:48 IST

स्कूली बच्ची के सवाल से शुरू हुआ सफर, सांगली के कलाकार ने बनाई 96 गणपति की मूर्तियां

45 साल बाद मिट्टी में हाथ डालने वाले नरेंद्र दामले का लॉकडाउन में शुरू हुआ शौक अब कारखाने जैसा काम बन गया है।

स्कूली बच्ची के सवाल से शुरू हुआ सफर, सांगली के कलाकार ने बनाई 96 गणपति की मूर्तियां
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

सांगली में रहने वाले नरेंद्र दामले इस साल 96 गणपति की मूर्तियां बना चुके हैं। इसकी शुरुआत हुई थी एक स्कूली बच्ची के मासूम से सवाल से, वो भी लॉकडाउन के मुश्किल दौर में।

दामले बताते हैं कि लॉकडाउन में उनकी दुकान बंद पड़ी थी, कमाई रुक गई थी और घर में रखा काफी सामान बेकार हो गया था। उसी दौर में उन्हें लगा कि कुछ नया करना चाहिए। पड़ोस में रहने वाली एक अंग्रेजी मीडियम स्कूल की बच्ची को स्कूल के लिए गणपति बनाना था। उसने दामले से पूछा, "काका, आपको आता है क्या? मुझे तो कुछ नहीं आता।"

दामले ने इससे पहले कभी गणपति की मूर्ति नहीं बनाई थी। बचपन में वो नागोबा और बैल बनाया करते थे, किले भी बनाते थे, लेकिन गणपति की मूर्ति का कोई अनुभव नहीं था। फिर भी उन्होंने बच्ची के लिए कोशिश की। पेंटिंग और स्केचिंग का शौक होने की वजह से शरीर के अनुपात, सिर और हाथों का अंदाजा उन्हें पहले से था। इसी के आधार पर उन्होंने पहली मूर्ति बनाई और वो काफी अच्छी बनी। यही पहली मूर्ति उनके इस कला सफर की शुरुआत बनी।

पहली मूर्ति सबको इतनी पसंद आई कि अगले साल घर में बनाई मूर्ति ही बिठाने का फैसला हुआ। इसके बाद हर साल मूर्तियों की संख्या बढ़ती गई। पहले साल एक मूर्ति, दूसरे साल 32, फिर 45, फिर 72 और इस साल पूरे 96 गणपति उन्होंने तैयार किए हैं। खास बात यह है कि यह सारा काम वो खुद करते हैं, रंग-रोगन और बाकी काम में घर के लोग मदद करते हैं। दामले कहते हैं कि पहले साल एक मूर्ति बनाई, लोगों को पसंद आई, फिर अगले साल हाथ थोड़ा मिट्टी में बैठ गया और संख्या बढ़ती गई, 32, 45, 72 करते-करते इस बार 96 मूर्तियां बनाई हैं।

गणपति का काम सिर्फ उत्सव के कुछ दिनों तक सीमित नहीं रहता। दामले दशहरे के मुहूर्त पर ही अगले साल के गणपति के काम की शुरुआत कर देते हैं। गणेशोत्सव खत्म होने के करीब महीने भर बाद दशहरा आता है, उसी दशहरे पर अगले साल के गणपति का मुहूर्त किया जाता है। इस वजह से लगभग 11 महीने गणपति का कारखाना चलता रहता है।

हाथ से मूर्ति बनाने के साथ-साथ दामले ने खुद अपनी मूर्तियों के सांचे भी तैयार किए हैं। बाजार से एक फुट का गणपति का सांचा लेने पर करीब 4500 रुपये खर्च आता है। लेकिन सिर्फ सांचे से मूर्ति पूरी नहीं होती, ऐसा वो साफ बताते हैं। सांचे से सिर्फ मूर्ति की बॉडी निकलती है। इसके बाद हाथ, सूंड, मुकुट और बाकी बारीक काम कलाकार को खुद ही करने पड़ते हैं। इसलिए सांचा होने के बावजूद हाथ की कारीगरी दिखानी ही पड़ती है।

दामले गणपति बनाने को सिर्फ धंधे की तरह नहीं देखते। उनका कहना है कि कला के तौर पर इस काम को संभालना है, गणपति की सेवा करनी है और अपने किए काम का मेहनताना लेना है।

वो यह भी मानते हैं कि पूरे परिवार का गुजारा सिर्फ मूर्ति बनाने के धंधे पर टिकाना आसान नहीं है। अगर पूरे परिवार की रोजी-रोटी इसी पर निर्भर करानी हो तो घर के सभी लोगों को यह काम आना चाहिए और मूर्तियों की संख्या भी बढ़नी चाहिए। सिर्फ गणपति बनाकर पूरा घर चलेगा, ऐसा सोचना ठीक नहीं है, ऐसा वो साफ कहते हैं। पहले वो दुकान संभालते हुए मूर्ति बनाने का काम करते थे। लेकिन अब उन्होंने दुकान पूरी तरह बंद कर दी है और अगले साल से पूरा समय मूर्ति बनाने के काम को ही देने का फैसला किया है।

बचपन से मिट्टी से जुड़ाव और पेंटिंग का शौक होने की वजह से दामले गणपति की मूर्तिकला को आकार दे पाए। लेकिन असल में गणपति बनाने की शुरुआत लॉकडाउन में हुई। दामले बताते हैं कि करीब 45-46 साल बाद उन्होंने दोबारा मिट्टी में हाथ डाला। इससे पहले वो बच्चों के लिए किले वगैरह बनाते थे, लेकिन गणपति की मूर्ति कभी नहीं बनाई थी। लॉकडाउन का वो छोटा सा प्रयास आज यहां तक ले आया।

मुश्किल दौर में की गई एक छोटी सी कोशिश आज उनकी जिंदगी की कला-साधना बन चुकी है। एक स्कूली बच्ची के गणपति से शुरू हुआ यह सफर आज 96 गणपतियों की शक्ल में खड़ा है।

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