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02:59 IST

सिंधुदुर्ग में खवळे परिवार का गणपति 21 दिन में तीन बार बदलता है रूप, विसर्जन पर होता है पिंडदान

कोकण के सिंधुदुर्ग जिले में खवळे परिवार 320 साल से चली आ रही अनोखी परंपरा के तहत गणेशोत्सव मनाता है, जिसमें मूर्ति का रूप उत्सव के दौरान तीन बार बदला जाता है।

सिंधुदुर्ग में खवळे परिवार का गणपति 21 दिन में तीन बार बदलता है रूप, विसर्जन पर होता है पिंडदान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र भर में और खासकर कोकण इलाके में गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। कोकण में गणेशोत्सव मनाने का अपना ही पारंपरिक तरीका रहा है, और इसी परंपरा को सिंधुदुर्ग जिले के खवळे परिवार ने पिछले 320 साल से बड़ी शिद्दत से बचाए रखा है। यह परिवार गणेशोत्सव को एकदम अलग अंदाज में मनाता है। यहां उत्सव डेढ़ दिन का नहीं, दस दिन का भी नहीं, बल्कि पूरे 21 दिन का होता है, और इन 21 दिनों में गणपति की मूर्ति का रूप तीन बार बदला जाता है। इतना ही नहीं, विसर्जन के दिन खास पिंडदान की रस्म भी निभाई जाती है।

खवळे परिवार का यह गणेशोत्सव कोकण में अपनी अलग पहचान रखता है। इस उत्सव को 320 साल पुरानी परंपरा का दर्जा हासिल है और यह पूरे 21 दिन तक चलता है। इन्हीं 21 दिनों के दौरान मूर्ति को तीन अलग-अलग रूपों में सजाया जाता है, जिसकी वजह से यह गणपति पूरे महाराष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचता है।

पौने छह फुट ऊंची इस मूर्ति को बनाने में डेढ़ टन मिट्टी लगती है। खवळे परिवार के इतिहास से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है। साल 1701 में इस परिवार के एक सरदार को बेटा न होने की चिंता सता रही थी। उस दौरान उन्हें नारायण मंदिर के गणपति ने सपने में दर्शन देकर मूर्ति स्थापित करने का आदेश दिया। इसी के बाद 'खवळे गणपति' की मूर्ति बनाकर विधिवत रूप से उसकी स्थापना की गई। खास बात यह है कि यह मूर्ति खवळे परिवार के सदस्य खुद ही तैयार करते हैं।

गणेश चतुर्थी के दिन मूर्ति पर सबसे पहले सफेद चूने से रंगाई की जाती है और सिर्फ आंखें रंगी जाती हैं। इसके बाद 21 दिनों की अवधि में मूर्ति पर अलग-अलग रंग किए जाते हैं, कभी लाल रंग तो कभी चांदी जैसा अंगरखा, पीतांबर, सोने का मुकुट, पांच फणों वाला नाग, कागज का पंखा और हाथ में शेला जैसी सजावट कर के गणपति को तीन अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है। इस दौरान लगातार रंगाई और नए रूप में तब्दील करने का काम चलता रहता है।

उत्सव के आखिरी दिन यानी विसर्जन के दिन गणपति के सामने खास पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है, जो खवळे परिवार के पूर्वजों को समर्पित है। विसर्जन के दिन होने वाला यह पिंडदान शायद कोकण में इकलौता ऐसा उदाहरण है। विसर्जन से एक रात पहले जागरण भी मनाया जाता है।

320 साल पुरानी इस परंपरा को 'लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड्स' में भी दर्ज किया जा चुका है। इसी वजह से खवळे गणपति को कोकण और महाराष्ट्र की एक अहम धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर सम्मान मिलता है।

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