सावनेर में डिफेंस न्यूक्लियर कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों का घेराव
सावनेर तहसील कार्यालय पर नौ गांवों के किसानों ने मार्च निकालकर तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा और साफ कहा कि जमीन किसी भी हालत में नहीं देंगे।
सावनेर में प्रस्तावित डिफेंस न्यूक्लियर कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण की कवायद के खिलाफ किसान सड़क पर उतर आए। बड़ी तादाद में किसानों ने मार्च निकाला और सीधे सावनेर तहसील कार्यालय का घेराव कर दिया। घेराव के दौरान किसान अपनी जमीन बचाने की मांग को लेकर जोर-जोर से नारेबाजी करते रहे।
प्रदर्शन में शामिल किसानों ने तहसीलदार और मौके पर मौजूद अधिकारियों को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा। किसानों ने दो टूक कहा कि वे इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए अपनी खेती की जमीन देने को तैयार नहीं हैं। प्रदर्शन के दौरान "जमीन हमारी है, हम इसे किसी भी हालत में नहीं देंगे" और "हम एक इंच भी जमीन नहीं देंगे" के नारे गूंजते रहे।
किसानों का कहना है कि खेती ही उनके परिवार की रोजी-रोटी का इकलौता सहारा है, इसलिए जमीन से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले प्रभावित किसानों से ठीक से बातचीत होनी चाहिए, पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
किसानों ने अपनी सारी आपत्तियां और मांगें प्रशासन के सामने दर्ज कराईं, जिसके बाद अधिकारियों ने बात सरकार तक पहुंचाने का भरोसा दिलाया। इस घेराव की वजह से तहसील कार्यालय परिसर में कुछ देर तक माहौल तनावपूर्ण बना रहा।
इस आंदोलन में नौ गांवों की आठ ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि और ग्रामीण शामिल हुए, जिन्हें प्रस्तावित कॉरिडोर से प्रभावित बताया जा रहा है। हर ग्राम पंचायत की तरफ से अलग-अलग निवेदन और ज्ञापन संबंधित अधिकारियों को सौंपे गए।
प्रदर्शन में मालेगांव के सरपंच धर्मेंद्रजी खोंडे, पूर्व सरपंच शंकररावजी मोवाड़े, चंद्रकांत सोमकुवर, जोगा के सरपंच शंकररावजी टोंगे, वामनराव मोवाड़े, पूर्व जिला परिषद सदस्य दिलीपराव उइके, ग्राम पंचायत जैतपुर-छत्रपुर के प्रतिनिधि मनोहर काकड़े, सलाई के श्रीकांत मोहतकर, भावेश वाखोरे, जटोमखोरा के सरपंच सोनू रावसाहेब, कृष्णजी पांडे, सावली के हरीश मोहतकर और दिलीप मोहतकर, खुरसापार के नानाजी माडेकर, भूषण कुबड़े और मंगेश जोगी सहित कई ग्रामीण प्रतिनिधि मौजूद रहे।
किसान संगठनों ने बताया कि उन्होंने अपनी आपत्तियां और मांगें प्रशासन के जरिए सरकार तक भेज दी हैं और उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े उनके मुद्दों पर सरकार गौर करेगी और उन्हें इंसाफ मिलेगा।
किसान संगठनों ने यह भी साफ किया कि जब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस फैसला नहीं होता, तब तक आंदोलन को आगे बढ़ाने पर विचार किया जाएगा।