गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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03:29 IST

हुथी हमलों के बीच सऊदी अरब ने अमेरिकी सेंटकॉम के जरिए इस्रायल से खुफिया मदद ली, पाकिस्तान-तुर्किये पीछे हटे

मक्का की सुरक्षा को लेकर बढ़े खतरे के बीच सऊदी अरब ने पारंपरिक सहयोगियों की जगह इस्रायल की तकनीकी और खुफिया ताकत का सहारा लिया है।

हुथी हमलों के बीच सऊदी अरब ने अमेरिकी सेंटकॉम के जरिए इस्रायल से खुफिया मदद ली, पाकिस्तान-तुर्किये पीछे हटे
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मिडिल ईस्ट की राजनीति और वैश्विक सुरक्षा के मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। येमेन के हुथी बागियों के लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के साथ-साथ लाल सागर में हो रही समुद्री नाकेबंदी की वजह से सऊदी अरब इस वक्त बेहद गंभीर सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है। अपने देश की सीमाओं और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को इस बढ़ते खतरे से बचाने के लिए सऊदी अरब ने एक बड़ा कूटनीतिक रास्ता चुना है। इस्रायल के साथ औपचारिक कूटनीतिक रिश्ते न होने के बावजूद सऊदी ने अमेरिका के सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम के जरिए इस्रायल से बेहद गोपनीय खुफिया जानकारी यानी ISR (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसन्स) हासिल करनी शुरू कर दी है, ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की वजह सऊदी अरब के पुराने और नए क्षेत्रीय दोस्तों का पीछे हट जाना बताया जा रहा है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हाल ही में एक आपसी सुरक्षा समझौता हुआ था, जिसमें यह तय हुआ था कि किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। लेकिन हुथी बागियों का खतरा बढ़ने के बाद जब सऊदी ने पाकिस्तान और तुर्किये से सीधी फौजी मदद मांगी, तो दोनों ही देशों ने येमेन की लड़ाई में सीधे उतरने से साफ इनकार कर दिया। इस इनकार के बाद सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा के लिए नए और अनपेक्षित समीकरणों पर सोचना पड़ा।

सऊदी अरब और इस्रायल के बीच कोई आधिकारिक कूटनीतिक रिश्ता न होने की वजह से रियाध ने इस्रायल से सीधी बातचीत करने के बजाय अमेरिका की मध्यस्थता कबूल की। अमेरिका की मध्य लष्करी कमांड यानी सेंटकॉम के जरिए ही यह खुफिया सहयोग आकार ले रहा है। इस समझौते के तहत इस्रायल सऊदी अरब को हुथी बागियों के अहम ठिकानों, उनकी लड़ाकू टुकड़ियों की मूवमेंट और मिसाइल अड्डों की सटीक जानकारी देगा।

अंतरराष्ट्रीय अखबारों में छपी रिपोर्टों के मुताबिक, फिलहाल यह सहयोग सिर्फ सुरक्षा से जुड़ी गुप्त जानकारी शेयर करने तक ही सीमित है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सहयोग की वजह से आने वाले वक्त में सऊदी और इस्रायल के बीच ऐतिहासिक अब्राहम करार की प्रक्रिया फिर से पटरी पर लौट सकती है।

इस ताजा विवाद और सुरक्षा की चिंता को और भी तेज कर दिया मक्का शहर की तरफ आए एक संदिग्ध ड्रोन की घटना ने। सऊदी सैन्य अधिकारियों ने दावा किया था कि उन्होंने पवित्र मक्का शहर की तरफ आ रहे एक हुथी ड्रोन को हवा में ही तबाह कर दिया। हालांकि हुथी बागियों ने मक्का को निशाना बनाने का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन इस घटना ने सऊदी प्रशासन की नींद उड़ा दी है।

इसके अलावा हुथी हमलों का सीधा असर सऊदी अरब के एनर्जी सेक्टर पर पड़ा है। सऊदी की बड़ी तेल पाइपलाइनों, रिफाइनरी और पंपिंग स्टेशनों पर हुए हमलों से तेल की सप्लाई कुछ हद तक बाधित हुई थी। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से बेहद संवेदनशील बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में समुद्री जहाजों पर हो रहे हमलों से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

सऊदी अरब के इस संकट में पाकिस्तान और तुर्किये का रुख काफी उलझा हुआ रहा है। पाकिस्तान ने सऊदी-येमेन बॉर्डर के पास सुरक्षा मजबूत करने के लिए अपनी फौज तैनात की और ईरान को हुथियों को रोकने के लिए संदेश भी भेजा, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से बचता रहा। वहीं तुर्किये ने भी सऊदी की सुरक्षा को समर्थन तो दिखाया, पर फौजी कदम उठाने से परहेज किया।

कुल मिलाकर, पाकिस्तान और तुर्किये के इस रवैये की वजह से सऊदी अरब ने इस्रायल की टेक्नोलॉजी और खुफिया क्षमता का इस्तेमाल करने का फैसला लिया है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि मिडिल ईस्ट में पुरानी दुश्मनी को भुलाकर सुरक्षा की वजह से एक नई साझेदारी आकार ले रही है।

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