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02:59 IST

भारतीय युवाओं में मानसिक तनाव: 49.5% अकेले झेलते हैं, सिर्फ 9.2% को मिलती है प्रोफेशनल मदद

एमपॉवर के सर्वे में सामने आया कि भारत के युवा अब भी अपना इमोशनल स्ट्रेस अकेले झेल रहे हैं और प्रोफेशनल मदद लेने वालों की संख्या बहुत कम है।

भारतीय युवाओं में मानसिक तनाव: 49.5% अकेले झेलते हैं, सिर्फ 9.2% को मिलती है प्रोफेशनल मदद
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

आदित्य बिर्ला एजुकेशन ट्रस्ट के तहत चलने वाली मेंटल हेल्थ सर्विस एमपॉवर ने एक नया सर्वे किया है, जिसमें पता चला है कि मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन भारत के युवा अब भी अपने इमोशनल तनाव से अकेले जूझ रहे हैं। इस सर्वे का नाम है "अनपॅक यूअर इमोशनल बैगेज: अ कॉल टू एक्शन फॉर यंग इंडियंस टू सीक हेल्प ड्यूरिंग इमोशनल डिस्ट्रेस"।

सर्वे के लिए मुंबई, पुणे, दिल्ली एनसीआर, बेंगलुरु, कोलकाता, अहमदाबाद, गोवा, हैदराबाद, चेन्नई और जयपुर - इन दस शहरों से 18 से 25 साल के युवाओं की राय ली गई। इसमें देखा गया कि युवाओं में इमोशनल स्ट्रेस कैसे बनता है, वे इससे कैसे डील करते हैं, और जब वे तकलीफ में होते हैं तो समाज उन्हें कैसे रिस्पॉन्स करता है। सर्वे में मेंटल हेल्थ की जागरूकता और मदद मांगने की उनकी इच्छा या क्षमता के बीच एक बड़ा गैप साफ दिखा।

मेंटल हेल्थ पर पब्लिक में बातें तो खूब हो रही हैं, लेकिन सर्वे के नतीजे बताते हैं कि भारत के 49.5 प्रतिशत युवा आज भी अपना तनाव छुपाकर रखते हैं और पूरी तरह अकेले उससे निपटने की कोशिश करते हैं। वहीं सिर्फ 9.2 प्रतिशत लोगों ने ही प्रोफेशनल की मदद ली है।

मदद मांगने से यह हिचक उनके तनाव को हैंडल करने के तरीके में भी दिखती है, जहां ज्यादातर लोग अपनी फीलिंग्स छुपाने की कोशिश करते हैं। 40.9 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे ठीक न होने पर भी दूसरों को "मैं ठीक हूं" कह देते हैं। कई लोगों ने कहा कि वे अपनी भावनाओं पर बात करने से पूरी तरह बचते हैं, या फिर जिस चीज से गुजर रहे होते हैं उससे ध्यान हटाने के लिए खुद को लगातार बिजी रखते हैं।

वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे के मौके पर आदित्य बिर्ला एजुकेशन ट्रस्ट और एमपॉवर की फाउंडिंग चेयरपर्सन नीरजा बिर्ला ने कहा, "जिन युवाओं से हमने बात की, उनमें से चालीस प्रतिशत को बस इतना कहा गया कि 'मजबूत बने रहो'। सिर्फ नौ प्रतिशत युवाओं को ही प्रोफेशनल से मदद मिल पाई। इन दो आंकड़ों के बीच कहीं न कहीं हम उन्हें समझने में नाकाम हो रहे हैं। हम किसी क्राइसिस के आने का इंतजार करते रहते हैं, तब जाकर कदम उठाते हैं। इसका इलाज यह है कि शुरुआत से ही स्कूलों में इसे पहचाना जाए, ताकि चुप रहना ही युवाओं के पास सिचुएशन को हैंडल करने का इकलौता तरीका न बन जाए।"

सर्वे से यह भी पता चलता है कि जब युवा अपनी फीलिंग्स एक्सप्रेस करते हैं, तो अक्सर उन्हें इग्नोर करने वाले जवाब मिलते हैं। "मजबूत रहो" (40.4 प्रतिशत) के अलावा युवाओं को बार-बार यह भी सुनने को मिलता है कि वे "ओवरथिंक कर रहे हैं" या उन्हें "काम या पढ़ाई पर फोकस करने" को कहा जाता है। इसके उलट सिर्फ 13.6 प्रतिशत लोगों ने ही कहा कि किसी ने बिना जजमेंट के उनकी बात सुनी और सपोर्ट किया।

चाइल्ड, एडोलसेंट और फैमिली साइकियाट्रिस्ट और एमपॉवर के चीफ मेडिकल एडवाइजर डॉ. जिराक मार्कर ने कहा, "मेंटल हेल्थ सिर्फ डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसा क्लिनिकल डायग्नोसिस नहीं है, बल्कि जीने का एक तरीका है, जो इसमें दिखता है कि हम अपने अंदर के विचारों को कैसे हैंडल करते हैं, रिश्ते कैसे निभाते हैं और इमोशनल दर्द को कैसे बाहर निकालते हैं। जब युवाओं को बार-बार 'मजबूत रहो', 'काम पर ध्यान दो' या 'ओवरथिंकिंग बंद करो' कहा जाता है, तो उनके दर्द को इग्नोर किया जा रहा होता है। तकलीफ छुपाना और फीलिंग्स दबाना दिमाग में खतरनाक तनाव पैदा करता है, जो गंभीर मामलों में सीवियर डिप्रेशन और सुसाइड तक ले जा सकता है। असली प्रिवेंशन यह है कि सिर्फ ऊपरी सलाह देने की बजाय स्कूल के हर क्लास में मेंटल हेल्थ एजुकेशन को शामिल किया जाए। कम उम्र में एम्पैथी और स्वीकार्यता बनाकर हम युवाओं को हेल्दी रहने के लिए जरूरी सेफ स्पेस, इज्जत और प्रोफेशनल केयर दे सकते हैं।"

सर्वे में तनाव कैसे बनता है इसमें साफ जेंडर गैप भी सामने आया। महिलाओं में इंटरनल इमोशनल स्ट्रेस ज्यादा दिखता है, जिसमें लगातार ओवरथिंकिंग (60 प्रतिशत महिलाएं), खुद पर शक (56 प्रतिशत) और बॉडी इमेज को लेकर चिंता (69 प्रतिशत) सबसे ऊपर हैं। पुरुषों में बाहरी तनाव ज्यादा दिखता है, जिसमें वर्क-रिलेटेड स्ट्रेस (57 प्रतिशत पुरुष) और फाइनेंशियल असुरक्षा (54 प्रतिशत) शामिल हैं। खास बात यह कि जब तक कोई दूसरा बता नहीं देता तब तक कुछ गड़बड़ है यह महसूस न करने वालों में 60 प्रतिशत पुरुष थे, जो बताता है कि युवा पुरुषों में इमोशनल सेल्फ-अवेयरनेस की कितनी जरूरत है।

यह भी सामने आया कि इमोशनल डिस्ट्रेस रोजाना की जिंदगी में कैसे दिखता है। 47 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें जल्दी गुस्सा आता है या चिड़चिड़ापन होता है, इसके बाद फोकस करने या चीजों का मजा लेने में दिक्कत (36.7 प्रतिशत) और रोजमर्रा के काम या रूटीन पर असर (31.3 प्रतिशत) का नंबर आता है।

यह सर्वे साफ बताता है कि सिर्फ जागरूकता बढ़ाना अब काफी नहीं है। इस वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे पर सिर्फ मेंटल हेल्थ पर बात करने की बजाय ऐसा माहौल बनाने पर फोकस करना होगा जहां युवाओं को कदम उठाना सेफ लगे। सुसाइड को रोकने की शुरुआत क्राइसिस आने से बहुत पहले होती है। इसकी शुरुआत उस कलंक, पूर्वाग्रह और इग्नोर करने वाले रिस्पॉन्स को खत्म करने से होती है, जो युवाओं को चुपचाप तकलीफ सहने पर मजबूर करते हैं। ऊपरी सलाह की बजाय एक्टिव और बिना जजमेंट वाला सपोर्ट देकर समाज जागरूकता और मदद के बीच के गैप को कम कर सकता है, ताकि किसी भी युवा को यह न लगे कि अपना तनाव अकेले झेलना ही एकमात्र रास्ता है।

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