गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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03:14 IST

बलराम जयंती: श्रीकृष्ण के बड़े भाई क्यों कहलाते हैं हलधर, जानें पौराणिक कहानी

भाद्रपद महीने की षष्ठी तिथि को भगवान बलराम की जयंती मनाई जाती है, जिन्हें हलधर नाम से भी जाना जाता है।

बलराम जयंती: श्रीकृष्ण के बड़े भाई क्यों कहलाते हैं हलधर, जानें पौराणिक कहानी
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

हिंदू धर्म में भाद्रपद महीने की षष्ठी तिथि का खास आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यही वो पवित्र दिन है जिसे भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम की जयंती के तौर पर मनाया जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस त्योहार को हल षष्ठी, बलदेव छठ, ललही छठ या बलभद्र जयंती के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू परंपरा के मुताबिक यह दिन शक्ति, संयम और खेती-किसानी की संस्कृति के प्रति सम्मान जताने का दिन माना जाता है।

भगवान बलराम की जन्मतिथि को लेकर अलग-अलग मत हैं। एक मान्यता के मुताबिक बलराम का जन्म हल षष्ठी के दिन हुआ था, इसी वजह से कई भक्त इसी दिन को उनकी जयंती के रूप में मनाते हैं। गर्ग संहिता के अनुसार भगवान बलराम का जन्म भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। यह तिथि बुधवार, 16 सितंबर को सुबह 8:59 बजे शुरू होकर 17 सितंबर को सुबह 10:47 बजे खत्म होगी। इसी वजह से बुधवार, 16 सितंबर को ही बलराम जयंती मनाई जा रही है।

बलराम के कई प्रचलित नामों में से एक नाम हलधर भी है, जिसका मतलब होता है नांगर धारण करने वाला। पौराणिक परंपरा के मुताबिक भगवान बलराम को नांगर और मूसल थामे एक योद्धा के रूप में दिखाया जाता है। उनका नांगर सिर्फ खेती का औजार नहीं बल्कि उनका मुख्य हथियार भी माना जाता है। इसी वजह से बलराम को हलधर, हलायुध और बलदेव जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। बलराम को खेती और धरती से जुड़ा देवता भी माना जाता है, यही कारण है कि उनकी पूजा में नांगर और खेती को खास अहमियत दी जाती है।

बलराम के जन्म की कहानी भगवान कृष्ण की कहानी से ही जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के मुताबिक बलराम का गर्भ शुरुआत में देवकी के गर्भ में ठहरा था। उस समय मथुरा के राजा कंस अपनी बहन देवकी की संतानों से डरा हुआ था। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने योगमाया को आदेश दिया कि देवकी के गर्भ में पल रहे सातवें गर्भ को रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया जाए। योगमाया ने ऐसा ही किया, और इसी वजह से माना जाता है कि बलराम रोहिणी के गर्भ से जन्मे। गर्भ के इसी स्थानांतरण की वजह से बलराम को संकर्षण नाम भी मिला, जिसका मतलब है एक जगह से दूसरी जगह खींचा जाना। इस तरह बलराम के जन्म की कहानी श्रीकृष्ण के अवतार की पूरी कथा की एक अहम कड़ी मानी जाती है।

बलराम जयंती के दिन सुबह स्नान करके भगवान बलराम का ध्यान किया जाता है। देवघर में उनकी तस्वीर या मूर्ति रखकर उन्हें पानी, फूल, फल और भोग अर्पित किया जाता है। मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान बलराम के साथ-साथ भगवान कृष्ण को भी याद किया जाता है।

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