गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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00:23 IST

वराह जयंती 2026: कब है तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त और तरीका जानिए

भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह जयंती इस बार 13 सितंबर को मनाई जा रही है, जानिए पूजा का सही समय और विधि।

वराह जयंती 2026: कब है तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त और तरीका जानिए तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

सतयुग की कहानी है कि जब भी अधर्म अपनी सारी हदें पार कर देता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में धरती पर आकर संतुलन बनाते हैं। हिरण्यक्ष नाम के राक्षस ने पृथ्वी को उठाकर समुद्र के तल में छिपा दिया था, जिससे चारों तरफ डर का माहौल बन गया था। उसी वक्त भगवान विष्णु ने एक ऐसा रूप लिया जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी, वो था वराह अवतार। सनातन धर्म में भगवान विष्णु के इस तीसरे अवतार के प्रकट होने का दिन बड़ी श्रद्धा से वराह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

द्रिक पंचांग के हिसाब से भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि 13 सितंबर सुबह 7:08 बजे शुरू होगी और 14 सितंबर सुबह 7:06 बजे खत्म होगी। उदय तिथि के मुताबिक वराह जयंती रविवार, 13 सितंबर को मनाई जाएगी।

भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा के लिए दोपहर का समय खास शुभ माना गया है। द्रिक पंचांग के अनुसार 13 सितंबर को दोपहर 1:30 से 4:00 बजे तक का समय वराह जयंती की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त है। इसी वक्त में भक्त भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

कथा के अनुसार सतयुग में हिरण्यक्ष नाम का एक बेहद ताकतवर राक्षस था। उसने पृथ्वी को उठाकर पाताल में छिपा दिया, जिससे हर तरफ संकट खड़ा हो गया। तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए वराह का रूप धारण किया। इसी रूप में वो पाताल गए, हिरण्यक्ष से युद्ध किया और उसका वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर उसकी असली जगह वापस स्थापित किया। इसी वजह से भगवान विष्णु के इस रूप को पृथ्वी के रक्षक के तौर पर भी जाना जाता है। वराह अवतार भगवान विष्णु के मुख्य अवतारों में गिना जाता है।

वराह जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाना चाहिए और साफ कपड़े पहनने चाहिए। इसके बाद पूजा की जगह साफ करके भगवान विष्णु के वराह रूप का ध्यान करें। सबसे पहले भगवान विष्णु को जल चढ़ाएं। फिर पीले फूल, फल, धूप और दीये अर्पित करें। भगवान को पीली चीजें चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और श्रद्धा के मुताबिक विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। इसके बाद भगवान वराह की कथा सुनें या पढ़ें। पूजा के आखिर में भगवान विष्णु की आरती करें और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें।

दक्षिण भारत के इलाकों में वराह जयंती के मौके पर वराह कलश की पूजा करने की परंपरा भी है। इस पूजा में भगवान वराह की मूर्ति को पानी से भरे कलश में रखा जाता है। फिर उस कलश को आम के पत्तों से ढका जाता है और उसके ऊपर एक नारियल रखा जाता है। इसके बाद विधि-विधान से कलश की पूजा की जाती है। पूजा पूरी होने पर उस कलश को किसी ब्राह्मण को दान करने की प्रथा है।

धर्म, ज्योतिष, वास्तु और फेंगशुई से जुड़ी ये बातें सिर्फ जानकारी के लिए हैं। इससे जुड़ा कोई भी उपाय करने से पहले जानकार से सलाह जरूर लें।

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