गणेश चतुर्थी: महाराष्ट्र के बाहर देश के इन 8 राज्यों में भी बप्पा का उत्सव धूमधाम से
महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे के मशहूर गणेश मंदिरों के साथ-साथ राजस्थान, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी गणेश चतुर्थी की धूम, जानिए किन मंदिरों में कैसे मनता है उत्सव।
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ढोल-ताशों की गूंज, फूलों की सजावट और बाप्पा के जयघोष के साथ पूरा देश गणपति के स्वागत के लिए तैयार है। कल, 14 सितंबर को घरों और मंडपों में गणपति की स्थापना करके विधिपूर्वक पूजा की जाएगी। शुरुआत में यह त्योहार महाराष्ट्र और उसके आसपास के इलाकों में लोकप्रिय था, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे देश में बड़े उत्साह से मनाया जाने लगा। भारत में कई मंदिर हैं जहां गणेश चतुर्थी बड़ी भव्यता और धूमधाम से मनाई जाती है।
मुंबई के प्रभादेवी में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर गणपति को समर्पित सबसे मशहूर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भारत और विदेश से भी बड़ी संख्या में भक्तों को खींचता है। गणेश चतुर्थी के दौरान यहां भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगती हैं और खास विधि, मंत्रोच्चार व भव्य आरती होती है। मंदिर की खासियत गणपति की वह मूर्ति है जिसकी सूंड़ दाईं तरफ मुड़ी हुई है। मूर्ति के चार हाथ हैं, ऊपर वाले दाहिने हाथ में कमल, ऊपर वाले बाएं हाथ में छोटी कुल्हाड़ी, नीचे वाले दाहिने हाथ में जपमाला और एक बर्तन में सिद्धिविनायक के प्रिय मोदक रखे हैं।
पुणे (महाराष्ट्र) का श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर देश के सबसे मशहूर और समृद्ध गणेश मंदिरों में गिना जाता है। हर साल गणेश चतुर्थी के वक्त इस मंदिर में देशभर के मशहूर मंदिरों या महलों की एकदम असली जैसी नकल तैयार की जाती है। इस साल वृंदावन के मशहूर प्रेम मंदिर की झलक दिखाने वाला एक भव्य पंडाल सजाया जाएगा। आम दिनों में मंदिर एक तय वक्त पर बंद हो जाता है, लेकिन गणेशोत्सव के दौरान यह भक्तों के लिए चौबीस घंटे खुला रहता है। इस मंदिर की स्थापना 19वीं सदी में श्री दगडूशेठ नाम के एक धनी हलवाई और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई ने की थी, जिन्होंने प्लेग की महामारी में अपना इकलौता बेटा खो दिया था। अपने दुख से निकलने के लिए उन्होंने भगवान गणेश का सहारा लिया। यहीं के सार्वजनिक गणेशोत्सव से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक ने देश को एकजुट करने के लिए एक बड़े उत्सव की शुरुआत की थी।
राजस्थान के सवाई माधोपुर में रणथंबोर गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी के शुभ मुहूर्त पर एक बड़ा लक्ष्मी मेला लगता है, जिसमें लाखों भक्त पहुंचते हैं। ऐतिहासिक रणथंबोर किले में मौजूद गणपति की मूर्ति की तीन आंखें (त्रिनेत्र) हैं और यहां गणपति का स्वागत करने की प्रथा है। यह देश के उन कुछ ही मंदिरों में शामिल है जहां गणपति अपनी पत्नी रिद्धी-सिद्धी, बेटों शुभ-लाभ और अपने वाहन चूहे के साथ विराजमान हैं। कहा जाता है कि यहां की मूर्ति किसी इंसान ने नहीं बनाई, बल्कि यह खुद-ब-खुद प्रकट हुई थी।
आंध्र प्रदेश के चित्तूर में कनिपकम विनायक मंदिर में गणेश चतुर्थी के दिन भव्य वार्षिक ब्रह्मोत्सव शुरू होता है, जो 20 दिन तक चलता है। इन दिनों गणपति की उत्सव मूर्ति को अलग-अलग रंगबिरंगे और परंपरागत वाहनों पर सजाकर पूरे इलाके में भव्य जुलूस निकाला जाता है। यहां स्थापित स्वयंभू गणपति की मूर्ति के बारे में माना जाता है कि यह लगातार आकार में बढ़ रही है। बताया जाता है कि 50 साल पहले उस पर चढ़ाई गई चांदी की ढाल अब मूर्ति को फिट नहीं होती। यह कनिपकम विनायक मंदिर आपसी झगड़े सुलझाने और सच की परीक्षा लेने के लिए भी जाना जाता है, जहां भक्त भगवान के नाम की कसम खाकर अपने मतभेद खत्म करते हैं।
महाराष्ट्र की अष्टविनायक यात्रा राज्य के बड़े धार्मिक तीर्थस्थलों में से एक है। भगवान गणेश को समर्पित इस यात्रा में भक्त आठ पवित्र गणेश मंदिरों के दर्शन करते हैं। इसमें मोरेश्वर, सिद्धटेक का सिद्धिविनायक, पाली का बल्लाळेश्वर, महाड का वरदविनायक, थेऊर का चिंतामणी, लेण्याद्री का गिरिजात्मज, ओझर का विघ्नेश्वर और राजनगाव का महागणपति मंदिर शामिल हैं। मान्यता है कि इन तीर्थस्थलों के दर्शन करने से गणपति बाप्पा का खास आशीर्वाद मिलता है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। गणेशोत्सव के दौरान इन मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ लगती है।