गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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02:00 IST

ईरान से मिले 11 जंगली गधों ने इस्राइल के रेगिस्तान को हरा-भरा बना दिया

रामोन क्रेटर में 44 साल पहले छोड़े गए दुर्लभ जंगली गधों ने नेगेव रेगिस्तान की तस्वीर बदल दी

ईरान से मिले 11 जंगली गधों ने इस्राइल के रेगिस्तान को हरा-भरा बना दिया
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

बीसवीं सदी की शुरुआत में इस्राइल के नेगेव रेगिस्तान में जंगली गधे बड़ी तादाद में पाए जाते थे। लेकिन बेतहाशा शिकार की वजह से यह प्रजाति इस इलाके से पूरी तरह खत्म हो गई थी। रेगिस्तान की बिगड़ती इकोसिस्टम को संभालने और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए इस्राइली अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने एक बड़ा फैसला लिया - इस ऐतिहासिक जमीन पर जंगली गधों को फिर से बसाने का। यह कोई आम पालतू गधे नहीं थे, बल्कि विलुप्त होने की कगार पर खड़ी दो बेहद दुर्लभ नस्लें थीं - पर्शियन ओनेजर (Persian Onager) और अफ्रीकन वाइल्ड ऐस (African Wild Ass)। इन्हें इस्राइल लाने के लिए बड़े स्तर पर डिप्लोमेसी और एक साहसी मुहिम चलानी पड़ी।

1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति होने से पहले ईरान और इस्राइल के रिश्ते काफी अच्छे और दोस्ताना थे। इस्राइल की नेचर एंड पार्क्स अथॉरिटी के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल अव्राहम योफे ने ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी से गुपचुप बातचीत की। इसी बातचीत के नतीजे में 1968 में ईरान के शाही अभयारण्य से 11 जंगली गधे इस्राइल को तोहफे में दिए गए, जिन्हें प्लेन के जरिए सुरक्षित तरीके से योतवाता वाइल्डलाइफ अभयारण्य लाया गया। बाद में इन जानवरों में जेनेटिक डायवर्सिटी बनाए रखने के लिए इस्राइल ने अफ्रीका के इथियोपिया से खास जहाजों और ट्रकों के जरिए अफ्रीकन जंगली गधे भी मंगाए। योतवाता के अभयारण्य में वैज्ञानिकों की निगरानी में इनका ब्रीडिंग प्रोग्राम शुरू हुआ।

करीब एक दशक तक चले ब्रीडिंग और पालन-पोषण के बाद 1982 में इस्राइली वैज्ञानिकों ने 28 सेहतमंद जंगली गधों का पहला झुंड नेगेव रेगिस्तान के बेहद कठोर, सूखे और चुनौतीपूर्ण रामोन क्रेटर इलाके में छोड़ा। इन जानवरों ने प्रकृति के साथ खुद को ढालते हुए अपने शरीर में हैरान करने वाले बदलाव ला लिए। आज 44 साल बाद इस रेगिस्तानी इलाके में इनकी तादाद 500 से 600 के पार पहुंच चुकी है। ये गधे 60 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकते हैं। इनका शरीर 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान झेलने में सक्षम बन गया है और ये बिना पानी के कई दिन तक जिंदा रह सकते हैं। पानी की कमी की वजह से इनके शरीर का वजन 30 फीसदी तक घट जाए, तब भी ये जिंदा बचे रहते हैं।

इन गधों ने सिर्फ अपनी जान नहीं बचाई, बल्कि पूरे रेगिस्तान की सूरत ही बदल डाली। तेज गर्मी में पानी की तलाश में ये गधे अपने पैरों से रेत में गड्ढे खोदते हैं। इन गड्ढों में जमा हुए पानी से लोमड़ी, हिरण और बाकी जंगली जानवरों को सूखे के मौसम में जीने का सहारा मिलता है। इसके अलावा ये गधे रेगिस्तान में उगे बबूल के पेड़ और उनके फल खाते हैं। इनके पाचन तंत्र के रसों से इन बीजों का सख्त छिलका नरम पड़ जाता है। जब ये गधे मीलों तक सफर करके गोबर के जरिए ये बीज बाहर निकालते हैं, तो रेगिस्तान में नए पेड़ उगने में मदद मिलती है। इनकी इन्हीं रोजमर्रा की हरकतों की वजह से आज रामोन क्रेटर का इलाका एक हरे-भरे नखलिस्तान में तब्दील हो चुका है, और दुनियाभर के पर्यावरण विशेषज्ञ इस मॉडल पर रिसर्च कर रहे हैं।

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