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02:21 IST

चांद पर एटम बॉम्ब गिराने की अमेरिका की खुफिया प्लानिंग रही थी, बाद में क्यों रुका ये प्रोजेक्ट

कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका ने चांद की सतह पर परमाणु बॉम्ब का धमाका करने की सीक्रेट प्लानिंग बनाई थी, जिसे बाद में रद्द करना पड़ा

चांद पर एटम बॉम्ब गिराने की अमेरिका की खुफिया प्लानिंग रही थी, बाद में क्यों रुका ये प्रोजेक्ट
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

ठंडे युद्ध यानी कोल्ड वॉर के जमाने में अमेरिका और सोव्हिएत युनियन (रशिया) के बीच सिर्फ हथियारों की रेस नहीं चल रही थी, बल्कि स्पेस में भी दोनों देश अपनी ताकत दिखाने में लगे थे। इस्ही होड़ में 1958 में अमेरिका ने एक ऐसा प्लान बनाने की सोची थी जिसकी आज कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। अमेरिकी एयर फोर्स ने चांद की सतह पर सीधे परमाणु बॉम्ब का धमाका करने की एक बहुत ही गुप्त योजना तैयार की थी। इस मिशन को कोड नेम 'प्रोजेक्ट A119' दिया गया था, जबकि सरकारी कागजों में इसे 'अ स्टडी ऑफ लुनार रिसर्च फ्लाईट्स' (A Study of Lunar Research Flights) कहा गया।

इंसान के इतिहास में कभी न हुई इस घटना के पीछे सिर्फ साइंटिफिक रिसर्च नहीं था, बल्कि पॉलिटिकल और मिलिट्री ताकत दिखाने की बड़ी रेस छुपी थी। मकसद यही था कि दुनिया को दिखाया जाए कि स्पेस टेक्नोलॉजी में अमेरिका सोव्हिएत युनियन से किसी भी तरह पीछे नहीं है।

इस तरह की एक्सट्रीम प्लानिंग के पीछे 1957 में हुई एक बड़ी घटना थी। 4 अक्टूबर 1957 को सोव्हिएत युनियन ने दुनिया का पहला मैनमेड सैटेलाइट 'स्पुटनिक-1' स्पेस में सफलतापूर्वक भेजा था। इससे पूरी दुनिया में रशिया की टेक्निकल तरक्की की धूम मच गई और अमेरिका के मिलिट्री और साइंटिफिक भरोसे को बड़ा झटका लगा। अमेरिकी लोगों और सरकार के बीच इस झटके से डर और शर्मिंदगी की फीलिंग फैल गई थी। इस शर्मिंदगी का बदला लेने और अमेरिकी जनता का भरोसा फिर से जीतने के लिए एयर फोर्स ने कुछ बड़ा और अनोखा करने की सोची। इस्ही बैकग्राउंड में 'आर्मर रिसर्च फाउंडेशन' (जो अभी इलिनॉय इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी का पार्ट है) की लीडरशिप में रिसर्चर्स की एक टीम बनाई गई और चांद पर एटम बॉम्ब का धमाका करने की पॉसिबिलिटी पर स्टडी शुरू हुई।

इस प्रोजेक्ट के हेड फिजिसिस्ट लियोनार्ड रायफेल (Leonard Reiffel) की लीडरशिप वाली टीम ने इस प्लान के अलग-अलग पहलू चेक किए। इस टीम में मशहूर एस्ट्रोनॉमर कार्ल सागन (Carl Sagan) भी शामिल थे, जिन्हें इस धमाके से बनने वाली धूल और रोशनी के फैलाव का गणितीय मॉडल बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

प्लान के मुताबिक, चांद के किनारे पर 'टर्मिनेटर' लाइन पर (जहां रोशनी और अंधेरा मिलते हैं) या रात वाले हिस्से में एक छोटा सा एटम बॉम्ब गिराने की सोच थी। जब यह धमाका होता, तो पैदा होने वाली तेज रोशनी और मलबे का फैलता बादल पृथ्वी से नंगी आंखों या टेलिस्कोप से साफ दिख जाता, ऐसी प्लानिंग थी। मकसद यही था कि दुनिया को अमेरिका की ताकत का अंदाजा हो जाए, यही इसके पीछे का मुख्य पीआर मकसद था।

आम तौर पर धरती पर जब एटम बॉम्ब फटता है, तो हवा के प्रेशर और वातावरण की वजह से छत्री जैसी शेप का धुएं का बादल यानी 'मशरूम क्लाउड' बनता है। लेकिन चांद पर ऐसा बादल बनना बिल्कुल पॉसिबल नहीं था, क्योंकि चांद पर धरती जैसा वातावरण नहीं है। साइंटिफिक स्टडी के मुताबिक, अगर चांद पर धमाका होता, तो वहां किसी तरह की शॉकवेव या मशरूम क्लाउड नहीं बनता। इसके बदले, धमाके की एनर्जी से चांद की मिट्टी और पत्थर तेजी से स्पेस में उड़ जाते और सूरज की रोशनी पड़ने से धरती से यह एक चमकता हुआ बड़ा बादल जैसा दिखता।

प्रोजेक्ट A119 पर काफी रिसर्च और गणितीय हिसाब किया गया था, लेकिन यह प्लान कभी असली में लागू नहीं हो पाया। इसके पीछे कई बड़ी साइंटिफिक और नैतिक वजहें थीं। साइंटिस्ट्स को डर था कि धमाके से बनने वाला रेडिएशन स्पेस में फैलकर पृथ्वी के वातावरण या आगे की इंसानी स्पेस मिशन्स में रुकावट डाल सकता है। इसके अलावा, एटम बॉम्ब से चांद की असली सतह रेडियोएक्टिव हो जाती और आगे चांद पर साइंटिफिक रिसर्च करना या वहां जीवन के निशान ढूंढना मुश्किल हो जाता। एक और डर यह भी था कि अगर एटम बॉम्ब लेकर जाने वाला रॉकेट लॉन्च के दौरान ही पृथ्वी के वातावरण में फट जाए, तो अमेरिका में ही बड़ी तबाही आ सकती थी।

इन सारे खतरों को देखते हुए 1959 में अमेरिकी एयर फोर्स ने इस प्रोजेक्ट को गुपचुप बंद कर दिया। इसके बाद 1967 में अमेरिका और रशिया समेत कई देशों ने 'आऊटर स्पेस ट्रीटी' (Outer Space Treaty) पर साइन किए, जिसके तहत स्पेस या चांद पर एटमी हथियारों की टेस्टिंग पर दुनियाभर में बैन लगा दिया गया।

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