गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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02:37 IST

चाणक्य नीति: इन 5 मौकों पर माफी मांगना समझदारी, बेइज्जती हो तो चुपचाप हट जाओ

चाणक्य नीति के मुताबिक जिंदगी में कब गलती मान के माफी मांगनी चाहिए और कब बिना इज्जत वाले रिश्ते से शांति से दूर हो जाना चाहिए, जानिए।

चाणक्य नीति: इन 5 मौकों पर माफी मांगना समझदारी, बेइज्जती हो तो चुपचाप हट जाओ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब समझ नहीं आता कि सामने वाले से माफी मांगनी चाहिए या अपनी बात पर अड़े रहना चाहिए। कभी एक छोटी सी गलती रिश्ते में दूरी ला देती है, तो कभी बेवजह का झगड़ा बंदे का टाइम और मन की शांति दोनों छीन लेता है। चाणक्य नीति में इसी बारे में बताया गया है कि कब माफी मांगनी चाहिए और इज्जत ना मिले तो कब चुपचाप हट जाना चाहिए।

चाणक्य नीति के हिसाब से गलती मान लेना कमजोरी की निशानी नहीं है। अगर आपके शब्दों से, बर्ताव से या फैसले से सामने वाले को तकलीफ पहुंची है, तो सबसे पहले अपनी गलती मान लेना जरूरी है। लोग अक्सर माफी मांगने से बचते हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि इससे उनकी इज्जत कम हो जाएगी, लेकिन रिश्तों में ऐसी सोच से अक्सर एक छोटी सी बात बड़ा झगड़ा बन जाती है।

हर बहस जीतना जरूरी नहीं होता। कुछ रिश्ते किसी झगड़े या छोटी जीत से कहीं ज्यादा कीमती होते हैं। अगर किसी गलतफहमी की वजह से परिवार, पुराने दोस्त या कोई भरोसेमंद अपना दूर हो रहा है, तो पहले बात करके हालात ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए। यहां फर्क समझना जरूरी है - रिश्ता बचाने के लिए झुक जाना और हर बार गलत बर्ताव बर्दाश्त करना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। अगर दोनों को रिश्ता बचाना है, तो माफी मांगना या पहल करना समझदारी हो सकती है।

हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। कुछ लोग बात सुलझाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी बात सही साबित करने के लिए बहस में उलझते हैं। ऐसे लोगों के साथ बार-बार होने वाली बहस अक्सर उसी मुद्दे पर खत्म होती है। ऐसी बहसें सोशल मीडिया पर भी दिखती हैं, जहां कोई भी पक्ष दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं होता। ऐसे में अपनी एनर्जी बचाना ही बेहतर है। जरूरी बात कह देने के बाद बहस को वहीं खत्म कर देना अक्सर सबसे समझदारी वाला जवाब होता है। चुप रहने का मतलब हमेशा हार मान लेना नहीं होता। रिश्ता हो, दोस्ती हो या कोई भी सामाजिक माहौल, हर इंसान को इज्जत चाहिए होती है। अगर कोई लगातार आपकी बेइज्जती कर रहा है, जानबूझकर आपकी बात को इग्नोर कर रहा है या हर बार आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है, तो सिर्फ रिश्ता बचाने के नाम पर ये सब बर्दाश्त करते रहना सही नहीं है। ऐसे में सबसे पहले अपनी लिमिट साफ बताना जरूरी है। अगर हालात नहीं बदलते, तो चुपचाप दूरी बना लेना एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। जरूरी नहीं कि हर रिश्ता झगड़े के साथ ही खत्म हो; कुछ रिश्तों से चुपचाप बाहर निकल जाना ही सही होता है।

जलन और लगातार की नेगेटिविटी से दूर रहें। अगर किसी इंसान के साथ रहकर आपको बार-बार निराशा या तनाव महसूस होता है, या बेवजह की क्रिटिसिज्म झेलनी पड़ती है, तो उस रिश्ते पर दोबारा सोचना चाहिए। खासकर तब जब उन्हें आपकी तरक्की से तकलीफ होती हो या वो हर अच्छी बात में भी कमी निकालते हों। चाणक्य नीति की इस बात का आज के जमाने से मतलब जोड़ें तो इसका ये मतलब नहीं कि हर आलोचना करने वाले को छोड़ दिया जाए। सही क्रिटिसिज्म हमें सुधरने में मदद करती है, लेकिन लगातार बेइज्जती, जलन और नेगेटिविटी वाले माहौल से दूर रहना मन की शांति के लिए फायदेमंद हो सकता है।

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