गुरूवार, 17 सितमबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
00:20 IST

ब्रिक्स समिट: नई दिल्ली में महासत्ताओं का जमावड़ा, भारत की रणनीति पर अमेरिकी मीडिया की नजर

रूस, चीन और ईरान जैसे अमेरिका के विरोधी देश भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में इकट्ठा, अमेरिकी अखबारों ने भारत के संतुलन साधने के तरीके का बारीकी से विश्लेषण किया

ब्रिक्स समिट: नई दिल्ली में महासत्ताओं का जमावड़ा, भारत की रणनीति पर अमेरिकी मीडिया की नजर तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नई दिल्ली में भारत की मेजबानी में हो रहे १८वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने दुनिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। एक तरफ ग्लोबल इकॉनॉमी और भू-राजनीति में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, दूसरी तरफ रूस, चीन और ईरान जैसे देश, जिन्हें अमेरिका का प्रमुख विरोधी माना जाता है, भारत की जमीन पर एक साथ जुट रहे हैं। इस समिट की हर छोटी-बड़ी बात और वहां होने वाले करार पर वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक के डिप्लोमैटिक हलकों की नजर टिकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की मुश्किल विदेश नीति के बीच रूस और चीन का भारत के साथ एक ही मंच पर आना अमेरिका के लिए चिंता की बात बन गया है।

अमेरिका के बड़े अखबारों जैसे द न्यूयॉर्क टाइम्स, द वॉल स्ट्रीट जर्नल और एसोसिएटेड प्रेस ने इस मीटिंग का गहराई से विश्लेषण किया है। इनका कहना है कि यह सिर्फ एक सालाना बैठक नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने वाली और ग्लोबल साउथ के देशों के बढ़ते असर को दिखाने वाली बदलती दुनिया की तस्वीर है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ का सबसे ताकतवर और भरोसेमंद चेहरा कौन बनेगा - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग? चीन का नजरिया हमेशा से ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी देशों की आर्थिक और डिप्लोमैटिक ताकत के खिलाफ इस्तेमाल करने का रहा है। बीजिंग ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी प्लेटफॉर्म बनाना चाहता है। इसके उलट भारत की रणनीति बिलकुल अलग और मल्टी-पोलर है। भारत की साफ मंशा है कि ब्रिक्स एक ऐसा ग्रुप बने जो सबको साथ लेकर चले, खुला रहे और नॉन-वेस्टर्न रहे, ना कि एंटी-वेस्टर्न। भारत नहीं चाहता कि दुनिया के किसी भी देश को अमेरिका बनाम चीन या रूस में से एक चुनने की मजबूरी आए। एनर्जी की बढ़ती कीमतों, रूस-यूक्रेन और मिडिल ईस्ट की जंग, अमेरिका के टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दों से परेशान बाकी विकासशील देश भी वाशिंगटन और बीजिंग के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से तय कर रहे हैं।

वाशिंगटन के स्टिमसन सेंटर के चायना प्रोग्राम की डायरेक्टर युन सन के मुताबिक भारत को लेकर चीन की सबसे बड़ी चिंता भारत का अमेरिका के साथ बढ़ता डिप्लोमैटिक और मिलिट्री तालमेल है। २०२० के गलवान वैली संघर्ष के बाद भारत-चीन रिश्ते बुरी तरह तने हुए थे, और २०२४ के बाद से दोनों देशों ने बहुत सावधानी से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू की। इसी बीच शी जिनपिंग का यह ७ साल में पहला भारत दौरा है। इसका एक और पहलू यह है कि २४ सितंबर को शी जिनपिंग व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने वाले हैं, इसलिए उससे पहले नई दिल्ली में मोदी से मुलाकात चीन के लिए डिप्लोमैटिक तौर पर बहुत अहम है।

द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक भारत और चीन दोनों को अमेरिका-चीन रिश्तों की अनिश्चितता का फायदा उठाकर आपसी तनाव कम करने का सुनहरा मौका मिला है। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में भारत के रूस से सस्ते दाम पर कच्चा तेल खरीदते रहने से भारत-अमेरिका रिश्तों में कुछ तनाव आया था, और इसी का फायदा उठाकर भारत अपनी विदेश नीति को फिर से संतुलित करने की कोशिश में है। हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत-चीन रिश्तों में यह सुधार सीमित ही रहेगा, क्योंकि सीमा विवाद अब भी नहीं सुलझा है, चीन और पाकिस्तान के करीबी मिलिट्री रिश्ते हैं और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर होड़ बनी हुई है, जिसकी वजह से भारत चीन पर आसानी से भरोसा नहीं करेगा।

वॉशिंगटन पोस्ट और एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक ब्रिक्स की मेजबानी करना भारत के लिए एक कड़ी नाप-तोल है। इस समिट में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और चीन के शी जिनपिंग मौजूद हैं। समिट से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन और पेजेश्कियान से अलग-अलग बिलैटरल बातचीत की थी। नए सदस्यों के जुड़ने से ब्रिक्स अब ११ देशों का बड़ा गठबंधन बन गया है, मगर इन सभी देशों के राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति के हित अलग-अलग हैं। इंटरनैशनल क्राइसिस ग्रुप के सीनियर एनालिस्ट प्रवीण डोंथी के मुताबिक, "ग्लोबल साउथ एक जैसी सोच वाला ग्रुप नहीं है, इसलिए यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के चल रहे संघर्षों पर एक राय बनाना ब्रिक्स के लिए मुश्किल होगा।" भारत के रूस और ईरान से पुराने ऐतिहासिक रिश्ते हैं, फिर भी अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्वाड देशों के साथ भारत की स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप भी मजबूत बनी हुई है। इसी वजह से भारत की यह संतुलन बनाने की कोशिश पूरी दुनिया के लिए दिलचस्पी और तारीफ की बात बनी हुई है।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे