गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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01:04 IST

ब्रिक्स समिट: बांगलादेश को न्योता था फिर भी नहीं, तारिक रहमान की नाराजगी की असली वजह सामने आई

दिल्ली में हो रही ब्रिक्स समिट में बांगलादेश के न्योते को लेकर विवाद, नए पीएम तारिक रहमान ने भाग लेने से किया इनकार

ब्रिक्स समिट: बांगलादेश को न्योता था फिर भी नहीं, तारिक रहमान की नाराजगी की असली वजह सामने आई
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

नई दिल्ली में १२ और १३ सितंबर को १८वीं ब्रिक्स शिखर परिषद हो रही है, जिसकी मेजबानी भारत कर रहा है। इस बड़े आयोजन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत दुनिया के कई बड़े देशों के प्रमुख शामिल हो रहे हैं। लेकिन इस समिट के बीच भारत के पड़ोसी देश बांगलादेश के साथ एक न्योते को लेकर राजनयिक विवाद खड़ा हो गया है। बांगलादेश के नए पीएम तारिक रहमान ने साफ मना कर दिया है कि वे इस परिषद में शामिल नहीं होंगे, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।

बांगलादेश के विदेश मामलों के राज्यमंत्री हुमायून कबीर ने ढाका में पत्रकारों से बात करते हुए पूरी बात साफ की। उनके मुताबिक भारत की तरफ से जो न्योता मिला है, वह बांगलादेश के पीएम को व्यक्तिगत या द्विपक्षीय तौर पर भेजा गया न्योता नहीं है। असल में इस वक्त बांगलादेश बिमस्टेक (BIMSTEC) यानी बंगाल की खाड़ी की बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग संस्था का अध्यक्ष है, और भारत ने यह न्योता सिर्फ बिमस्टेक के अध्यक्ष के नाते भेजा है। यही वजह है कि तारिक रहमान का बांगलादेश के पीएम के तौर पर इस बैठक में जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता, ऐसा कबीर ने बिल्कुल साफ शब्दों में कहा।

वहीं भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस विवाद पर अपनी सरकारी बात रखते हुए बताया कि बांगलादेश ब्रिक्स का पूरा सदस्य देश नहीं है। ब्रिक्स के नियमों के हिसाब से जो देश या संगठन सदस्य नहीं हैं लेकिन क्षेत्रीय रूप से अहम हैं, उन्हें सिर्फ 'आउटरीच' यानी संपर्क सत्रों के लिए बुलाने की परंपरा रही है। भारत ने इसी नियम का पालन करते हुए बिमस्टेक के मौजूदा अध्यक्ष के नाते बांगलादेश के प्रमुख को संपर्क सत्र के लिए बुलाया था। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इसमें कोई भी बेइज्जती करने की मंशा नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चिट्ठी पर संबोधन का बहुत मतलब होता है। जब किसी चिट्ठी में लिखा जाता है "माननीय पीएम, कृपया आएं", तो इसे दोनों देशों के बीच सीधा द्विपक्षीय सम्मान माना जाता है। लेकिन जब लिखा जाता है "बिमस्टेक अध्यक्ष, कृपया आएं", तो उस न्योते का दायरा सिर्फ क्षेत्रीय प्रतिनिधि तक सीमित रह जाता है। भले ही इंसान एक ही हो, इन दो अलग-अलग संबोधनों के पीछे बड़े राजनयिक संकेत छिपे होते हैं। बांगलादेश के विदेश मंत्रालय ने इसी फर्क को उजागर करते हुए इस परिषद से दूर रहना बेहतर समझा।

अगस्त २०२४ में बांगलादेश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल के बाद उस वक्त की पीएम शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया था और भारत में शरण ली थी। तब से नई दिल्ली और ढाका के रिश्तों में तनाव बना हुआ है। अब तारिक रहमान की अगुआई में बांगलादेश में नई सरकार बन चुकी है, और ढाका अपनी विदेश नीति को नए सिरे से गढ़ रहा है। ऐसे में ब्रिक्स जैसे बड़े वैश्विक मंच पर कौन सी तस्वीर सामने आती है, किसके साथ द्विपक्षीय बातचीत होती है और किसे क्या दर्जा दिया जाता है, इस पर पूरी दुनिया की नजर रहती है।

भारत ने बांगलादेश को पूरी तरह किनारे नहीं किया है। बिमस्टेक अध्यक्ष के नाते दिया गया न्योता यही दिखाता है कि क्षेत्रीय सहयोग के दरवाजे भारत ने बंद नहीं किए हैं। लेकिन ब्रिक्स मंच पर किसे खास राजनीतिक दर्जा देना है और किसे नियम के मुताबिक बुलाना है, इस मामले में भारत ने अपना रुख कड़ा रखा है। फिलहाल ब्रिक्स के ११ सदस्य देश हैं और बांगलादेश उनमें शामिल नहीं है। आगे चलकर दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते किस दिशा में जाते हैं, यह देखना अहम रहेगा।

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