भंडारा में 21 साल में 781 किसानों की आत्महत्या, सिर्फ 305 परिवारों को मिली मदद
धान उत्पादक भंडारा जिले में किसान आत्महत्याओं का मामला अभी भी गंभीर बना हुआ है, सरकारी आंकड़ों में 476 मामले अपात्र ठहराए गए हैं।
धान की खेती वाले भंडारा जिले में किसान आत्महत्याओं का मसला अभी भी चिंता की बात बना हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक 2003 से 2024 तक, यानी 21 साल के दौरान, जिले में 781 किसानों ने आत्महत्या की। इनमें से 305 मामलों को ही सरकारी मदद के लिए पात्र माना गया, जबकि 476 मामले अपात्र करार दिए गए। यानी कुल दर्ज हुई आत्महत्याओं में करीब 61 फीसदी मामले सरकारी मदद के दायरे में ही नहीं आ पाए।
इसके बाद 2025 में 50 और जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 10 और किसान आत्महत्याएं दर्ज हुईं। 2026 के इन 10 मामलों में से सिर्फ 2 मामले ही पात्र ठहराए गए, और दोनों परिवारों को एक-एक लाख रुपये यानी कुल दो लाख रुपये की मदद दी गई।
किसान की आत्महत्या के पीछे हमेशा एक ही वजह नहीं होती। खेती में नुकसान, कर्जा और आर्थिक तंगी के साथ-साथ पारिवारिक, सामाजिक और निजी हालात भी इसकी वजह बन सकते हैं, इसलिए हर मामले की जांच में सारे पहलुओं पर संवेदनशीलता से गौर करना जरूरी है। आंकड़े देखें तो 2015 में 56 में से 32 मामले पात्र ठहराए गए थे और 2016 में 54 में से 41 मामले पात्र निकले। लेकिन 2023 में 56 में से सिर्फ 14 और 2024 में 60 में से महज 13 मामलों को ही मदद के लायक माना गया।
जो मामले पात्र ठहराए जाते हैं, उनमें वारिसों को सरकार की तरफ से एक लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। जिले में 2003 से 2024 के बीच पात्र ठहराए गए 305 मामलों के लिए कुल 3 करोड़ 5 लाख रुपये की मदद बांटी जा चुकी है। 2025 में 50 आत्महत्या मामलों में से 14 पात्र और 36 अपात्र ठहराए गए। 2026 में अगस्त तक दर्ज हुए 10 मामलों में 2 पात्र और 8 अपात्र निकले।
भंडारा के निवासी उपजिल्हाधिकारी मनोहर चव्हाण के मुताबिक, नियम के हिसाब से हर मामले की पूरी जांच और जुड़े कागजातों की पड़ताल के बाद ही तय निकषों पर खरे उतरने वाले पात्र मामलों को आर्थिक मदद दी जाती है। उन्होंने बताया कि 2026 में अगस्त तक दर्ज हुए 10 मामलों में से जो पात्र ठहराए गए, उन परिवारों को एक-एक लाख रुपये की मदद दी गई है।
आत्महत्या के मामले में मदद के लिए पात्रता तय करने का काम बेहद बारीकी से होता है। घटना के बाद यह जांचा जाता है कि मामला सरकारी मदद के तय निकषों में फिट बैठता है या नहीं। इसमें नापिकी यानी फसल का बर्बाद होना, कर्जा और कर्ज वसूली का दबाव, ये मुख्य आधार माने जाते हैं। अगर जांच में आत्महत्या का संबंध इन वजहों से साबित हो जाए तो मामला पात्र ठहराया जाता है, वरना अपात्र करार दे दिया जाता है। इसके लिए राजस्व और पुलिस महकमे की टीमें खेती की हालत, कर्जे की जानकारी, मौजूद कागजात और आत्महत्या की वजहों की पड़ताल करती हैं, उसके बाद ही पात्रता का फैसला होता है।
धान उगाने वाले किसानों पर आर्थिक दबाव जिले में बहुत ज्यादा है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में किसान धान की फसल पर ही निर्भर हैं। लेकिन बढ़ती खेती लागत, मौसम की अनिश्चितता, नापिकी, कर्जे का बोझ, धान बेचने में आने वाली दिक्कतें और बाजार में दाम के उतार-चढ़ाव की वजह से खेती का गणित अक्सर बिगड़ जाता है।