9 सितंबर : दिमाग तेज रखने वाले नंबर गेम सुडोकू का दिन, जानें इतिहास और फायदे
हर साल 9 सितंबर को दुनियाभर में आंतरराष्ट्रीय सुडोकू डे मनाया जाता है, यह सिर्फ एक पजल नहीं बल्कि दिमाग की कसरत का त्योहार है।
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आजकल की भागदौड़ भरी और डिजिटल जिंदगी में जितना ध्यान बॉडी की फिटनेस पर दिया जाता है, उतना ही ध्यान अब दिमाग की सेहत पर भी देना जरूरी हो गया है। बॉडी को फिट रखने के लिए लोग एक्सरसाइज करते हैं, लेकिन दिमाग को एक्टिव रखने के लिए क्या किया जाए, इसी सवाल के जवाब में हर साल 9 सितंबर को दुनियाभर में आंतरराष्ट्रीय सुडोकू डे बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक गेम का जश्न नहीं है, बल्कि इंसानी दिमाग की ताकत और तार्किक सोच को सलाम करने का दिन है। सुडोकू एक ऐसा पजल है जिसने अपने सिंपल मगर चैलेंजिंग नियमों से दुनियाभर के लाखों लोगों को अपना दीवाना बना रखा है।
बहुत लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर इसी गेम के लिए 9 सितंबर की तारीख ही क्यों चुनी गई। इसके पीछे एक दिलचस्प और लॉजिकल वजह है। सुडोकू का स्टैंडर्ड बोर्ड 9x9 ग्रिड का होता है यानी कुल 81 खाने, जिनमें 1 से 9 तक के नंबर यूज होते हैं। साल का 9वां महीना यानी सितंबर और उसी महीने की 9 तारीख (9/9), यह सुडोकू के 9x9 स्ट्रक्चर से बिल्कुल मैच करती है। इसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए वर्ल्ड पजल फेडरेशन (World Puzzle Federation - WPF) ने 2013 में ऑफिशियली 9 सितंबर को आंतरराष्ट्रीय सुडोकू डे के तौर पर घोषित किया था। तब से हर साल यह दिन ग्लोबल लेवल पर मनाया जाता है।
आम तौर पर सुडोकू को जापानी गेम माना जाता है, लेकिन इसकी हिस्ट्री उससे कहीं बड़ी है। 18वीं सदी में स्विस मैथमेटिशियन लियोनार्ड यूलर ने 'लैटिन स्क्वेयर' नाम का एक कॉन्सेप्ट दिया था, जो सुडोकू से मिलता-जुलता था। 1979 में अमेरिका के आर्किटेक्ट और पजल-मेकर हॉवर्ड गार्न्स ने मॉडर्न सुडोकू की डिजाइन तैयार की। उन्होंने इसे 'नंबर प्लेस' (Number Place) नाम दिया था। 1984 में यह गेम जापान पहुंचा, जहां जापानी मैगजीन 'निकोली' ने इसका नाम बदलकर "सुजी वा दोकुशिन नि कागिरू" रख दिया, जिसका सीधा मतलब है "नंबर सिर्फ एक बार यूज होना चाहिए"। इसी वाक्य के शॉर्ट फॉर्म से नाम बना 'सुडोकू'। 2004 में लंदन के 'द टाइम्स' अखबार ने सुडोकू छापना शुरू किया, और उसके कुछ ही महीनों में यह गेम दुनियाभर में मशहूर हो गया।
सुडोकू खेलना सिर्फ टाइम पास नहीं, बल्कि दिमाग की बढ़िया एक्सरसाइज है। साइंटिफिक नजरिए से इसके कई फायदे बताए जाते हैं। सुडोकू सॉल्व करते वक्त मैथ्स की जरूरत नहीं होती, सिर्फ लॉजिक चलाना पड़ता है। कौन सा नंबर किस खाने में फिट बैठेगा या नहीं बैठेगा, यह सोचने से दिमाग के बाएं हिस्से को एक्सरसाइज मिलती है, जिससे एनालिटिकल थिंकिंग डेवलप होती है। मोबाइल के इस जमाने में लोगों का अटेंशन स्पैन घटता जा रहा है, ऐसे में सुडोकू खेलते वक्त पूरा ध्यान खानों पर लगाना पड़ता है, जिससे शॉर्ट-टर्म मेमोरी और कॉन्संट्रेशन दोनों सुधरते हैं। जब आप सुडोकू में डूबे रहते हैं तो दिमाग रोज की टेंशन से दूर रहता है, यह एक तरह का 'डिजिटल डिटॉक्स' या 'माइंडफुलनेस' जैसा काम करता है। रिसर्च के मुताबिक, बढ़ती उम्र में रोज दिमागी गेम खेलने से ब्रेन सेल्स एक्टिव रहती हैं, जिससे डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाता है। स्कूल के बच्चे सुडोकू खेलें तो उनकी ऑब्जर्वेशन पावर और मुश्किल हालात में लॉजिक से रास्ता निकालने की स्किल भी बढ़ती है। दुनियाभर में यह दिन क्रिएटिव तरीकों से मनाया जाता है। स्कूल-कॉलेजों में स्टूडेंट्स की मेंटल एबिलिटी टेस्ट करने के लिए सुडोकू कॉम्पिटिशन रखे जाते हैं। कई गेमिंग ऐप्स और वेबसाइट्स इस दिन स्पेशल लाइव कॉम्पिटिशन, टाइम-ट्रायल चैलेंज और नई तरह के पजल जैसे किलर सुडोकू, समुराई सुडोकू उपलब्ध कराते हैं। कई अखबारों में इस दिन स्पेशल सुडोकू पजल छापे जाते हैं और लोग एक-दूसरे को सुडोकू की किताबें गिफ्ट करते हैं। आंतरराष्ट्रीय सुडोकू डे यह याद दिलाता है कि जैसे बॉडी के मसल्स मजबूत रखने के लिए एक्सरसाइज चाहिए, वैसे ही ब्रेन सेल्स को हेल्दी रखने के लिए मेंटल चैलेंज की जरूरत होती है। चाहे छोटे बच्चे हों, यंगस्टर्स हों या सीनियर सिटीजन, रोज 10 से 15 मिनट सुडोकू सॉल्व करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद आदत है।